ग़ज़ल
बिछा कर रास्तों में एक चादर बैठ जाते हैं
कहां जाएंगे वो जिनके मुकद्दर बैठ जाते हैं
वक्त लेता है जब करवट तो अक्सर देखा है हमने
जो समझा करते थे खुद को सिकंदर बैठ जाते हैं
नहीं आया जो दिन में रात को क्या आएगा फिर भी
ज़रा सी होती है आहट हम उठ कर बैठ जाते हैं
धीमी चाल मंज़िल पर ले ही जाती है कछुए को
लंबी दौड़ में खरगोश अक्सर बैठ जाते हैं
तनहाई सताए तो तेरी यादों के पंखों पर
ज़मीं से उड़ते हैं जाकर उफ़क़ पर बैठ जाते हैं
— भरत मल्होत्रा
