नासूर बन गया है ये तथाकथित विकास
आज चारों ओर नदियों का रौद्र रूप,
नोच रख लिया हमने नदियों का मार्ग,
उफान पर है छोटी बड़ी सारी नदियां,
नदियां कर रही अतिक्रमण का अब विनाश।
नदियां का रुप ममतामयी होता है,
आज बदल गया नदियों का स्वरूप,
पोषणमयी व रक्षक वाली ये नदियां
हो गई है नदियां विकराल और क्रूर।
क्यों तबाही मची हुई है चारों ओर,
नदियां दिखा रही है विध्वंसकारी रुप
आज मानव ने अपने स्वार्थ के खातिर,
दानव बन कर नदियों का बर्बाद कर है।
जंगलों को बहुतायत से काटे हैं,
पक्के पहाड़ों को बारूद से उड़ाये है,
विकास के झूठे सपने दिखा कर,
कंक्रीट के जंगल नदियों के रास्ते में बनाए है।
नदियों अविरल धारा पर बांध बनाये हैं,
धरती का पर्यावरण को बिगाड़ दिया है,
नासूर बन गया है ये तथाकथित विकास,
प्राकृतिक आपदाओं को निमंत्रण दे रहा है।
— कालिका प्रसाद सेमवाल
