ग़ज़ल
अपनी हालत का जिम्मेदार समझते हैं मुझे
यहां कुछ लोग गुनाहगार समझते हैं मुझे
मैं अपनी मर्ज़ी से सांसें भी ले नहीं सकता
और मेरे दोस्त शहरयार समझते हैं मुझे
सबूत क्यों दूं मैं उनको वतनपरस्ती का
जो खुद गद्दार हैं, गद्दार समझते हैं मुझे
सुख आते ही चुरा लेते हैं नज़रें मुझ से
लोग बस दुख का सांझेदार समझते हैं मुझे
कल जो रद्दी की टोकरी में चला जाएगा
आप वो आज का अखबार समझते हैं मुझे
— भरत मल्होत्रा
