भुजारिया त्योहार
त्योहार नहीं, बल्कि समाज में आपसी प्यार और तहज़ीब की खूबसूरत मिसाल है।
भारत में भुजारिया त्योहार एक रिवायती और क़दीम त्योहार है, जो खुसूसन मध्य प्रदेश, और उत्तर भारत के कुछ इलाक़ों में बड़े शौक़ और जोश के साथ मनाया जाता है।ये त्योहार ख़ास तौर पर रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है।इसका ताल्लुक़ ख़ुशहाली, बारिश, नई फ़सल और भाईचारे से है।इस त्योहार का मक़सद बारिश की दुआ मांगना, फ़सल की बरकत और आपसी मिलन को बढ़ाना होता है।त्योहार की रस्में,त्योहार की तैयारी रक्षाबंधन से एक हफ़्ता पहले शुरू होती है। घरों में मिट्टी के छोटे बर्तन या बांस की टोकरी में गेहूं या जौ के दाने बोए जाते हैं, जिन्हें “भुजारिया” कहा जाता है।ये बीज तकरीबन एक हफ़्ते में अंकुरित हो जाते हैं।रक्षाबंधन के बाद महिलाएं और बच्चियां इन भुजारीयों को सर पर रखकर, नग़मे गाते हुए नहर, तालाब या कुएं की तरफ जुलूस में जाती हैं और वहां इनका विसर्जन करती हैं।
इस मौके पर मेलजोल के गीत गाये जाते हैं, एक-दूसरे को भुजारिया पेश किया जाता है और बड़ों से दुआ सलाम लिया जाता है।
भुजारिया त्योहार की जड़ें आल्हा-ऊदल जैसे बहादुर बुंदेलखंडी किरदारों से जुड़ी मानी जाती हैं।समाज में ये त्योहार रूठों को मनाने, नए दोस्त बनाने और मेल-जोल बढ़ाने का जरिया है।बच्चों, औरतों और बुज़ुर्गों में ख़ास जोश पाया जाता है, इलाके के खेल, कुश्ती, मेला और मौसीकी की महफ़िलें इसका हिस्सा होती हैं।भुजारिया की रस्में और रिवायतें सदियों पुरानी हैं और तमाम लोक कहानियों व ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। ये सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि समाज में आपसी प्यार और तहज़ीब की खूबसूरत मिसाल है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
