खुद को पढ़ी मैं
जिंदगी के हर एक पहलुओं को
जब-जब लिख मैंने सजाया है।।
हर बार एक नया घाव शब्दों में
नया भाव उभार ही लाया है।।
हर एक नये भाव संग जब लिखी
लेखन शैली में निखार पाया है।।
खुद के लिये लिख खुद को पढ़ती,
खुद को ही पढ़ सुकून आया है।।
पहले सोचती थी लोग क्या सोचेंगे
दर्द में सबने ताना ही सुनाया है।।
नहीं सोचती लोगों के बारे मे अब मैं
खुद के लिये जीना जो आया है।।
पहले चलाई सिर्फ दर्द पर कलम
बस दर्द ही लिखना जो आया है।।
वक्त संग जिया , अब अपने लिये
हर विषय पर लिखना जो आया है।।
सीख बहुत ही पाई जिंदगी से मैंने
अपनों का भी साथ ना मैंने पाया है
नज़र अंदाज़ कर रही रिश्तों को मैं
खुद के दर्द पर विजय मैंने पाया है।।
— वीना ‘तन्वी’
