लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 21)
भरत जी ने अपनी सेना को पर्वत की तलहटी में ही रोक दिया और जब तक अगला आदेश न मिले, तब तक वहीं विश्राम कर लेने का आदेश दिया। फिर उन्होंने अपने भाई शत्रुघ्न जी से कहा- “सौम्य! तुम बहुत से मनुष्यों और निषादों को भी साथ लेकर चारों ओर श्री राम के आश्रम की खोज करो। मैं स्वयं भी मंत्रियों और पुरवासियों सहित पैदल ही वन में विचरण करके उनकी खोज करूँगा। जब तक मुझे श्री राम के दर्शन नहीं होंगे, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी। जब तक मैं श्री राम के चरणों पर अपना सिर नहीं रख लूँगा, तब तक मेरे मन को शान्ति नहीं मिलेगी। जब तक श्री राम के शीष पर अयोध्या का मुकुट नहीं देख लूँगा, तब तक मुझे शान्ति प्राप्त नहीं होगी।”
ऐसा कहकर महातेजस्वी भरत जी ने उस विशाल वन में पैदल ही प्रवेश किया। आगे जाकर उन्होंने चित्रकूट पर्वत पर एक लम्बा शालवृक्ष देखा तो उस पर चढ़ गए और वहाँ से उन्होंने श्री राम के आश्रम को खोजने के लिए चारों ओर दृष्टि डाली। उन्होंने एक स्थान पर ऊपर उठता हुआ धुआँ देखा। उन्होंने सोचा कि यही श्री राम का आश्रम हो सकता है और यहीं पर श्री राम होंगे। यह सोचकर उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने शत्रुघ्न जी को आश्रम के चिह्न दिखाये, फिर उनके साथ उसकी ओर चले।
इसके साथ ही भरत जी ने एक मंत्री के द्वारा गुरु वशिष्ठ जी को यह संदेश भेज दिया कि वे माताओं को साथ लेकर आश्रम की ओर शीघ्र आ जायें। फिर वे तेज़ी से उस आश्रम की ओर बढ़ गये। शत्रुघ्न जी और सुमन्त्र जी भी उनके साथ ही चल रहे थे। शीघ्र ही उनको आश्रम की ओर जाते समय कुछ मार्ग सूचक चिह्न दिखाई पड़ने लगे। वे समझ गये कि यह चिह्न आश्रम की ओर जाने के लिए हैं। वास्तव में वे चिह्न लक्ष्मण जी ने इसलिए बनाये थे कि वे कुटी का मार्ग न भूल जायें।
उन मार्गबोधक चिह्नों की सहायता से भरत जी, शत्रुघ्न जी तथा मंत्री सुमंत्र जी शीघ्र ही कुटी के निकट पहुँच गये। वहाँ उन्हें मृगों की लेंडी और भैंसों के गोबर के सूखे कंडों का ढेर दिखाई दिया, जो शीतकाल में आग तापने के लिए लगाया गया था। उसे देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और अपने साथियों से बोले- “लगता है कि हम महर्षि भरद्वाज द्वारा बताये गये स्थान पर आ पहुँचे हैं और मंदाकिनी नदी यहाँ से अधिक दूर नहीं है।“
महर्षि भरद्वाज जी ने उनको बताया था कि मंदाकिनी नदी चित्रकूट पर्वत के उत्तरी किनारे से बहती है। श्री राम और भरत जी दोनों उत्तर की ओर से ही चित्रकूट गये थे, परन्तु उन्हें मंदाकिनी नदी पार करने की आवश्यकता नहीं हुई। वास्तव में श्री राम ने मंदाकिनी के उत्तरी किनारे से थोड़ी ही दूरी पर अपनी पर्णकुटी बनायी थी। वह स्थान चित्रकूट पर्वत का ही भाग था और वहाँ पर बहुत घने जंगल थे, जिससे वहाँ फलदार वृक्षों की अधिकता थी। इस प्रकार वह स्थान वनवास के लिए बहुत सुविधाजनक था।
आस-पास खोज करते हुए भरत जी ने वन में एक बड़ी पर्णशाला देखी, जो बहुत मनोरम थी। वह वृक्षों से घिरी हुई थी और वृक्षों के बहुत से पत्तों द्वारा छायी गयी थी और उसमें कुश बिछाये गये थे। वहीं धनुष और तरकश, तलवारें, ढाल और चमड़े के दस्ताने भी टँगे हुए थे। तरकश तीरों से भरे हुए थे। कुटी के मुख्य द्वार के बाहर निकट में ही यज्ञ की वेदी बनी हुई थी।
पर्णकुटी को थोड़ी देर ध्यान से देखकर भरत जी ने उसके परिसर में बैठे हुए श्री राम को देखा, जिन्होंने सिर पर जटा धारण की हुई थी। वे यज्ञ वेदी पर सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ बैठे हुए थे। उनको इस स्थिति में देखकर भरत जी शोक में डूब गये और यह सोचकर रोने लगे कि मेरे कारण ही श्री राम इस दशा में रह रहे हैं।
भरत जी अपने साथियों से कहने लगे- ”जो श्री राम राज्य सिंहासन पर बैठकर मंत्रियों से घिरे रहकर राजसभा में शोभा पाने योग्य हैं, वे यहाँ जंगल में कुश आसन पर जंगली पशुओं से घिरे बैठे हैं। जो श्री राम बहुमूल्य रेशमी वस्त्र धारण करते थे, वे यहाँ वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए बैठे हैं। जिनका सिर सदैव सुगन्धित द्रव्यों और पुष्पों से शोभित होता था, वे जटा धारण करके रह रहे हैं। जो श्री राम सदैव सुख भोगने योग्य हैं, वे ही यहाँ वन के कष्ट सह रहे हैं। इसके लिए मैं ही दोषी हूँ। मेरे ही कारण उनको ये कष्ट सहन करने पड़ रहे हैं। मेरे जीवन को धिक्कार है।“ इस प्रकार कहते और विलाप करते हुए वे तेजी से श्री राम की ओर चले।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 13, सं. 2082 वि. (21 अगस्त, 2025)
