कहानी

अफ़साना – पुराने रिश्ते

आख़िरकार मासाब का पुराना मकान मिल ही गया।
नंदू बड़ी खुशी और हल्की घबराहट के साथ शहर पहुँचा था। उसका बेटा अब शादी के बंधन में बंधने वाला था। दिल में उसने ठान रखा था कि जिन लोगों ने जीवन में उसे राह दिखाई, उनकी चौखट पर जाकर निमंत्रण देना उसका फ़र्ज़ है। सबसे पहले उसे याद आए अपने बड़े मासाब ,वही , जिनकी सेवा उसने बचपन में मन से की थी।स्कूल में जब बाकी बच्चे खेलों में मस्त रहते, तब नंदू कभी तख़्ती धोता, कभी ब्लैकबोर्ड चमकाता, तो कभी कापी-कागज़ सजाता। डाँट भी पड़ी, थप्पड़ भी खाए, मगर नंदू के लिए मासाब की हर डाँट ममता जैसी ही थी।और आज… बरसों बाद जब शादी का कार्ड लेकर उनके दरवाज़े पर पहुँचा तो शहर की भीड़, गर्मी और अजनबी गलियों ने उसे पसीने में नहला दिया। घर ढूँढने में मुश्किल हुई, पर आख़िरकार मासाब का पुराना मकान मिल ही गया।दरवाज़ा खोला तो सामने मासाब थे।
“सलाम मासाब! मैं नंदू… आपका पुराना शागिर्द।”पहले तो सहसा पहचान न पाए, फिर आँखों में चमक आ गई, “अरे, नंदू? तू आज भी याद करता है मुझे?”
नंदू ने कांपते हाथों से शादी का कार्ड उनके आगे रखा,
“मासाब, मेरे लिए सम्मान ये होगा कि आप ज़रूर आइए। मैं चाहता हूँ मेरा बेटा जाने कि उसके बाप ने अपने गुरू को हमेशा दिल में रखा।”मासाब ने कार्ड लिया भी, मगर उनकी आँखों में कोई और सवाल तैर रहे थे। सोचने लगे,
“कहीं ये ग़रीब मुझसे पैसे-वगैरह मांगने तो नहीं आया?”
चेहरे पर मुस्कान थी मगर जुबान पर दूसरा ही रस।
उन्होंने बात बदलते हुए कहा,”थक गया होगा, आ चाय पी ले।”चाय आ गई, पर भोजन का ज़िक्र तक न हुआ। बच्चों को पुकार कर बुलाया भी नहीं।
नंदू ने चुपचाप चाय पी और भारी मन से उठ गया। दिल में सोचता रहा,”शायद बड़े लोग ऐसे ही होते हैं। हम तो दिल से रिश्ते निभाते हैं, वे बस रस्म निभा देते हैं।”उसे याद आया, कैसे कभी मासाब के बेटा-बेटियों को उसने अपनी गोद में उठाकर घुमाया था, उनके लिए मिठाइयाँ लाया था, मेले से खिलौने खरीद कर दिए थे। मगर आज? कोई भी दरवाज़े पर आकर उसे पहचानने तक न निकला।
गाँव लौटते समय उसके दिल में कसक तो थी, मगर उसने खुद को समझाया,
“मैंने अपना फ़र्ज़ निभाया। बुलाना मेरा काम था, आना-न-आना अब उनकी मर्ज़ी।”
शादी भव्य रूप से संपन्न हुई। नंदू ने जी-जान से अहसान चुकाया, मेहमानों को इज़्ज़त दी। केवल मासाब न आए। उनका घर वैसा ही बंद रहा, और उसी बंद घर में कहीं दबा रहा नंदू का शादी का कार्ड,खुला तक नहीं।
कुछ दिन बाद शुक्ला जी, जो उसी गाँव में अध्यापक थे, अचानक मासाब से मिलने पहुँचे। मुलाक़ात पर मासाब ने पूछा,
“अरे भई शुक्ला जी, कहाँ से आ रहे हो?”
शुक्ला जी हँसते हुए बोले:
“नंदू के लड़के की शादी से आ रहा हूँ साहब… क्या शानदार शादी की है! पूरे गाँव ने देखा, बड़ा रुतबा हुआ उसका।”मासाब सुनते ही नि:शब्द रह गए। भीतर कहीं एक दर्द-सा घर कर गया। उस कार्ड को जिस पर उन्होंने नज़र तक न डाली थी, उसी में वो खुशी लिखी थी जिसे सबने देखा, बस उन्होंने नहीं।शुक्ला जी चले गए। कमरे में अकेले मासाब की निगाह मेज़ पर पड़ी। वहाँ धूल तले दबा वही कार्ड रखा था। काँपते हाथों से उठाकर खोल ही लिया। और जब पढ़ा “डॉ. आनंद (एम.बी.बी.एस.)”
नंदू के बेटे का नाम देख उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।सालों तक जिन्हें उन्होंने ग़रीब समझा, उसी नंदू ने अपने बेटे को डॉक्टर बना दिया।और विडंबना देखिये, खुद मासाब अपने ही बेटे को अच्छी तालीम भी न दिलवा पाए थे।कार्ड उनके हाथ से फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़ा, मगर दिल पर जो बोझ गिरा, वो ज़िन्दगी भर न उठ सका।मासाब की आँखें नम हो गईं। उन्होंने सोचा,
“मैंने पूरी उम्र किताबें पढ़ाईं, मगर आज शागिर्द ने मुझे सबसे बड़ा सबक सिखाया ,कि मेहनत और सच्चा दिल ही असली गुरू हैं।”उस दिन मासाब की आँखें धुँधली थीं। उनका दिल पछतावे से भरा था। और उसी कमरे में, धूल-जमे कैलेंडर और गिरे हुए कार्ड के बीच ,समय की सबसे सख़्त सच्चाई दर्ज़ थी,
कभी-कभी शिष्य वही हासिल कर लेता है, जो गुरू नहीं कर पाता।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।