छुपकर बैठा
डुबाया है हर बार मुझे
अथाह गहराई में
तथाकथित मेरे सारे अपनों ने,
जब जब तैर कर पार करना चाहा
दरिया को मेरे सपनों ने,
सारे सपने पूरे हो जाने से
और किसे हो सकता है तकलीफ,
वो निकाल लाते हैं
बरबाद करने के लिए नये नये तकनीक,
मेरी सफलता से क्या लाभ उन्हें,
उद्वेलित करती रहती है उनकी चाह
जब तब नेस्तनाबूद करने मुझे,
करता हूं तुम्हारी परवाह
ये दिखाना है जमाने के साथ मुझे भी,
पर जमाना न समझे उनकी कुटिलता
मगर मैं नहीं अनजान उनकी मंशा से,
तीक्ष्णता भरी दुर्गंध महसूस कर लेता हूं
उनकी भूरी भूरी प्रसंशा से,
जनाब वे सब आपको लगते होंगे
सदाशयता से भरे हुए इंसान,
लेकिन मैंने देखा है
उनके अंदर में छुपकर बैठा हुआ शैतान,
वे मेरे न थे,न हैं और न कभी होंगे।
— राजेन्द्र लाहिरी
