लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 24)
अगले दिन प्रातःकाल सभी भाई और अन्य लोग अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के लिए मंदाकिनी नदी के तट पर गये और स्नान-ध्यान आदि सम्पन्न करके पुनः सभी आश्रम में आ बैठे। सभी लोग उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे कि अब भरत जी श्री राम से क्या कहेंगे और उनको कैसे अयोध्या लौट चलने के लिए सहमत करेंगे। उचित अवसर देखकर भरत जी ने बहुत विनम्रता से श्री राम से कहा- “भैया! पिताजी ने वरदान देकर मेरी माता को संतुष्ट कर दिया और माता ने यह राज्य मुझे दे दिया। अब मैं अपनी ओर से यह अकंटक राज्य आपको समर्पित करता हूँ। आप इसका पालन और उपभोग कीजिए। इस विशाल और वैभव सम्पन्न राज्य को सँभालना आपके सिवा किसी अन्य के लिए बहुत कठिन होगा। आप ही इसके सच्चे अधिकारी हैं। जैसे कोई गदहा किसी घोड़े की समता नहीं कर सकता, उसी प्रकार मेरे जैसे व्यक्ति में आपके आदर्शों का पालन करने शक्ति नहीं है।
पिताजी ने इस राज्य को अपने परिश्रम से सँभाला था और भविष्य में इसकी रक्षा के लिए आप जैसा सभी सद्गुणों से सम्पन्न पुत्र उत्पन्न किया था। यदि आप इसे अपने हाथों में नहीं लेंगे, तो पिताजी का सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा। यदि आप पूर्ण रूप से समर्थ होने पर भी इस राज्य को ग्रहण नहीं करेंगे और हम सबका पालन-पोषण नहीं करेंगे, तो पिताजी की आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी।
महाराज! विभिन्न जातियों के समूहों के सभी प्रधानों का भी यही मत है कि वे आपको तपते हुए सूर्य की भाँति अयोध्या के राज्यसिंहासन पर विराजमान हुए देखें। आपको अयोध्या लौटते हुए देखकर सभी प्रसन्नतापूर्वक आपका अभिनन्दन करेंगे।”
वहाँ उपस्थित सभी नगरवासियों ने ‘साधु! साधु!!’ कहकर भरत जी की बात का समर्थन किया और कई प्रधानों ने बारी-बारी से खड़े होकर अपने-अपने शब्दों में भरत जी के कथन की सराहना करते हुए उनका अनुमोदन किया और श्री राम से अयोध्या लौट चलने की प्रार्थना की।
धैर्यपूर्वक सबकी बात सुनकर श्री राम ने भरत जी से कहा- “भाई भरत! हमारे धर्मात्मा पिताजी ने यह राज्य तुम्हें दिया है, इसलिए तुम अयोध्या में रहकर प्रजा की रक्षा करो। पिताजी मुझे वन में रहने का आदेश देकर गये हैं, इसलिए मैं उसका पालन करने के लिए यहाँ रह रहा हूँ। पिताजी के आदेश की अवहेलना करना मेरे लिए कदापि उचित नहीं होगा। इसलिए मैंने वन में ही रहने का दृढ़ निश्चय कर लिया है।
शत्रुदमन भरत! तुम्हारे लिए भी पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन करना उचित नहीं है, क्योंकि पिताजी ही हम लोगों के सबसे बड़े हितैषी बन्धु और जन्मदाता थे। नरश्रेष्ठ! परलोक पर विजय पाने की इच्छा रखनेवाले व्यक्ति को सदा धार्मिक, अहिंसक और गुरुजनों की आज्ञा का पालन करनेवाला होना चाहिए। इसलिए तुम अयोध्या जाकर राज्य को सँभालो और पिताजी की आज्ञा पालन करो।”
इस प्रकार देर तक कई तर्क देकर भरत जी को समझाकर श्री राम चुप हो गये, परन्तु भरत जी को इससे सन्तोष नहीं हुआ। भरत जी ने दुःखी होते हुए श्री राम से कहा- “भैया! जैसे आप हो, वैसा इस संसार में कोई नहीं हो सकता। आप सद्गुणों के भण्डार हो। कोई भी दुःख आपको विचलित नहीं कर सकता और कोई प्रिय बात आपको प्रफुल्लित भी नहीं कर सकती। आप देवताओं की भाँति सत्वगुण से सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ और बुद्धिमान हैं। आप जन्म-मरण के रहस्य को जानते हैं, इसलिए कोई असह्य दुःख आपके निकट नहीं आ सकता।
अपने अन्तिम समय में पिताजी मोह और अज्ञान के वशीभूत होकर मेरी माता के कहने में आकर ऐसा वचन दे बैठे, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मैं उस समय परदेश में था, तब नीच विचार रखने वाली मेरी माता ने जो पाप कर डाला वह मुझे इच्छित नहीं है। आप उसे क्षमा करके मुझ पर प्रसन्न हों। धर्म की मर्यादा में बँधे होने के कारण मैं उसको कोई दण्ड नहीं दे सकता, नहीं तो मैं उसे मार डालता।
राजन्! आप हम सबकी और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने क्षात्र धर्म का पालन करें। प्रजा का पालन करना ही आपका सबसे बड़ा कर्तव्य है। जटा-जूट धारण करके वन में विचरण करना आपके योग्य कर्म नहीं है। इसलिए आप पितरों के ऋण से मुक्त हों और अयोध्या का राज्य सँभालें। यदि आप मेरी प्रार्थना ठुकरा देंगे, तो मैं भी आपके साथ वन को ही जाऊँगा।” यह कहते हुए भरत जी ने श्री राम के चरणों में मत्था टेककर प्रणाम किया।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद शु. 4, सं. 2082 वि. (27 अगस्त, 2025)
