ओ निर्मोही तू सुनता जा
सुनता जा, ओ निर्मोही पथिक,
क्यों किया तूने हृदय भ्रमित?
लोचन अब तुझको ढूँढ रहे,
मुझे बिसार कर है क्यों हर्षित?
टीस जिया की ना पहुँची तुम तक,
सूख गए अश्रु, नयन हुए थक।
हर आहट पर दौड़े ये पग,
पथरा गईं अखियाँ, देखूँ अपलक।
मिली नहीं पर दबी है चाह,
नहीं सुनी क्या मेरी आह?
ज़िक्र न कर पाऊँ पर हर पल,
लेता जा पथिक, दिल की थाह।
कई कई पाती लिख डाली,
पते में बस दिल रख डाला।
ओ रंगरेज, अब रंग भर दे,
मिली वो पाती दिल वाली?
रक्ताभ गुलमोहर-सा रंग भर दे,
बासंती अमलतास-सा तन कर दे।
धानी धरा-सी लहराऊँ, लजाऊँ,
सतरंगी चुनरिया अब तो कर दे।
— सविता सिंह मीरा
