गीत/नवगीत

तुम भी ठाकुर हो सकते हो

बेशक तुम को क्षत्राणी की, कोख नहीं मिल पाई होगी।
हर ठाकुर की शान देखकर, तन में जलन समाई होगी।।

शायद इसीलिए मन ही मन, कुण्ठित हो कर डाह रहे हो।
मुँहजोरी को जंग समझकर, ठाकुर होना चाह रहे हो।।

तो जब असली युद्ध ठनेगा, सोचो सुख से सो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।1।।

बहस किया करते हो अक्सर, इनसे हम कैसे कमतर हैं?
खून एक रँग का हम सबमें, फिर कैसे इतने अन्तर हैं??

कद-काठी रँग-रूप एक सा, एक धरा का जीवन जीते।
छाया-धूप हवा-नभ षट् रस, अन्न एक सा पानी पीते।।

इसका उत्तर सुनकर मन पर, चढ़ी मलिनता धो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।2।।

एक प्रकृति के होने पर भी, जड़ें एक सी नहीं मिलेंगी।
किसी पेड़ की दो पत्ती भी, एक सरीखी नहीं मिलेंगी।।

दोनों आम दशहरी-लँगड़ा, दोनों एक बाग के फल हैं।
खुशबू, बनक, मिठास, कसावट, अलग-अलग दोनों अविचल हैं।।

क्या तुम स्वाद एक ही खुशबू, इनमें कभी समो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।3।।

ये वे हैं जो युद्ध भूमि में, प्राणों की परवाह न करते।
सिर पर कफन बाँध कर चलते, सुख की किंचित चाह न करते।।

जलती हुई चिताओं से क्या, खुशी-खुशी तुम खेल सकोगे?
मौत सामने हो छाती पर, वार बज्र से झेल सकोगे?

रणचण्डी की गलमाला में, क्या निज मुण्ड पिरो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।4।।

अपनों की क्या कहें शौक है, असहायों के संकट हरना।
क्षत्रिय धर्म नहीं है उस क्षण, किसी तरह आफत से बचना।।

तुम बोलोगे अपने को क्या, होता है सो होने देना।
बेमतलब कीचड़ में फँसना, अपने को क्या देना-लेना।।

पथ में नदी उबलती उसमें, परहित देह डुबो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।5।।

बचपन से ही हर ठाकुर की, साँसें दूनी हो जाती हैं।
निरपराध की पीड़ा सुनकर, आँखें खूनी हो जाती हैं।।

दुश्मन सुख से बैठ न पाए, कूटनीति के दाँव भरे हैं।
माताओं ने इनके भीतर, कूट-कूट कर भाव भरे हैं।।

दही सरीखे जमें रक्त को, तुम रण बीच बिलो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।6।।

क्या जीवन की चाह छोड़ कर, बलि वेदी पर शीष धरोगे?
राजपूत की तरह मौत से, पहले क्या बेमौत मरोगे??

मातृभूमि के लिए बेहिचक, प्राण समर्पण कर सकते हो?
क्या तुम शत्रु समक्ष मारने-मरने का प्रण कर सकते हो??

छोड़ मखमली सजी सेज क्या, शर शैय्या पर सो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।7।।

दीन-दुखी ज्ञानी-ध्यानी को, अपनी सेवा दे पाओगे?
शरणागत के लिए दुश्मनों, से क्या लोहा ले पाओगे?

नारी और बिलखते बच्चों, से अपना मुँह मोड़ सकोगे?
बूढ़े माता-पिता तड़पते, हुए पलँग पर छोड़ सकोगे?

आँसू बिना बहाए खुद के, रण में दर्द भिगो सकते हो।
यदि ऐसा कर सकते हो, तो तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।8।।

रक्षा और प्रबन्धित शासन, करना इन्हें स्वत: आता है।
प्रेम-क्षमा धन-दान-दया का, धर्म-कर्म करना भाता है।।

माना शौर्य-सुधा यश-रस की, बूँद पिलाना गरल नहीं है।
फिर भी सुन लो बहुत कठिन है, ठाकुर होना सरल नहीं है।।

प्राणों से प्यारी आँखों को, बिना तड़प क्या खो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।9।।

हार-जीत की फ़िक्र छोड़ ये, आन-बान पर मिटने वाले।
संविधान की रीति-नीति पर, सिंह सरीखे चलने वाले।।

अगर तुम्हारे गली-गाँव में, सच के लिए लड़ाई होगी।
मरियल से‌ मरियल ठाकुर की, हिम्मत अलग दिखाई देगी।।

हिन्दू, हिन्दराष्ट्र के हित में, अपना मान डुबो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।10।।

साहस-फुर्ती, निर्भय वाणी, दृढ़ता-विनय, क्षमा लक्षण हैं।
परहित, समझ, धर्म, अनुशासन, शान-मान क्षत्रिय के गुण हैं।।

बचपन से ही इन्हें विषैली, घुट्टी घोंट पिलानी होती।
प्राण हथेली पर रख चलना, सच्ची कसम दिलानी होती।।

मोह त्याग घर में बलिदानी, बीज शौर्य के बो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।11।।

जलो न गलो असम्भव क्या है, जन्म नहीं तो कर्म सँभालो।
लिपटे हुए तिरंगे में शव, उठने की अभिलाषा पालो।।

हर पीड़ित का रक्षक होकर, क्षत्रिय गुण मन से अपना लो।
फिर ठाकुर साहब से ऊँची, ठाकुर जी की पदवी पालो।।

भारतमाता के चरणों में, क्या ये भाव सँजो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।12।।

जिस दिन राष्ट्र धर्म की खातिर, प्राण परिन्दा हो जाओगे।
कीर्ति पताकाएँ फहरेंगी, मरकर जिन्दा हो जाओगे।।

फिर ठाकुर ही नहीं समूचा, देश तुम्हें सरदार कहेगा।
तुम पर गर्व करेगा खुलकर, मन से जय-जय कार करेगा।।

तरण वरण की शरण सभ्यता, मरण जानकर ढो सकते हो?
यदि ऐसा कर सकते हो तो, तुम भी ठाकुर हो सकते हो।।13।।

— गिरेन्द्रसिंह भदौरिया “प्राण”

गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण"

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