वर्तमान में महिलाओं की मानसिक स्थिति के प्रति जिम्मेदार कौन ?
वैश्वीकरण की इस दौड़ में महिलाएं पुरुष के समान कार्य करने में सक्षम हो रही है वह परिवार तथा समाज के बीच एक सेतु का कार्य करते हुए पारिवारिक दायित्वों का वहन करने में आठों पहर कार्य करने के लिए दृढ़ संकल्पित हो रही है। वह परिवार के प्रत्येक सदस्य पर ध्यान केंद्रित करते हुए जीवन को जी रही हैं ।वर्तमान समय में घर बाहर की दोहरी जिम्मेदारी उठाते हुए महिलाएं भावनात्मक एवं मानसिक स्तर पर धीरे धीरे कमजोर होती जा रही है ।परिवार की सदस्यों की देखभाल करते हुए अपने स्वास्थ्य के लिए 10 मिनट निकालने का समय नहीं है।आश्चर्य तब होता है, जब परिवार के लोग भी महिलाओं को महत्व नहीं देते इस तरह महिलाओं को दोयम दर्जे पर रखी जाने वाली सोच उनके स्वास्थ्य को और अधिक प्रभावित करती है। वह अपनी शारीरिक व मानसिक पीड़ा को खुलकर नहीं बता सकती। इसका भंयकर परिणाम होता है कि ना सही समय पर इलाज मिलता और ना ही सलाह ।शहरी महिलाओं की अपेक्षा ग्रामीण महिलाओं की स्थिति भी बहुत बदतर है । गांवों में जागरूकता की कमी के कारण नीम – हकीम जादू टोटके के जाल में महिलाएं इतना फंस जाती है, कि बीमारी अधिक बढ़ जाने से जीवन भर की त्रासदी को झेलती रहती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण परिवार में सहयोग की कमी ,महिलाओं का सम्मान ना होना, विघटन की स्थिति आदि कारण उत्तरदायी है। अधिकांश महिलाओं के पति या अन्य सदस्य हिंसात्मक व्यवहार करते हैं तथा चाहरदिवारी के भीतर महिलाओं के साथ दुर्भाव पूर्ण व्यवहार किया जा रहा है ।जिससे पारिवारिक एवं आंतरिक रूप से समस्याओं को देखकर अंदर ही अंदर जूझती
रहती है ।जिससे उनमें शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होने लगता है ।विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में आठ में से एक महिलाऐं किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रस्त हैं।जिनमें चिंता और अवसाद सबसे ज्यादा हैं। महिलाओं को गर्भावस्था के समय पर्याप्त पोषक तत्व न मिलना, ,देखभाल न होना ,अपनों के प्रति संरक्षण की कमी के कारण मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है ।सन 2020 के बाद भारत अवसाद से ग्रसित दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश हो गया है। कोविद-19 रूपी महामारी के बाद महिलाएं दोहरी भूमिका को करने के लिए बाध्य हो गई इससे महिलाओं में भेदभावपूर्ण व्यवहार, घरेलू हिंसा और बलात्कार जैसे मामले हर उम्र की महिला को मानसिक रोगी बना रहे हैं । राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में अधिकांश महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है ।केवल घरेलू ही नहीं बल्कि कामकाजी एवं आत्मनिर्भर महिलाएं भी कटुतापूर्ण व्यवहार से आहत हो रही है। आज ग्रामीण महिलाओं के साथ कामकाजी महिलाओं में दोहरे व्यक्तित्व के कारण अधिक तनाव, अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो गई है।कई बार देखने में आता है, कि मानसिक रूप से बीमार महिलाओं के परिवार के सदस्य सही चिकित्सा की जगह झाड़ फूंक और टोटकों की सहायता से इलाज कराते हैं ।।ऐसे में महिलाएं शारीरिक उत्पीड़न की शिकार हो जाती हैं। अनेक सुर्खियों से ज्ञात हुआ है, कि पीड़ित महिला को डायन या पागल कह कर उनकी जायदाद, धन संपत्ति से वंचित कर उनके साथ कटुता पूर्ण व्यवहार या घर से बेदखल कर दिया जाता है। वर्तमान समय में महिलाओं का एक बड़ा वर्ग प्कामकाजी है घर परिवार में भूमिका को निभाते हुए आर्थिक सामाजिक क्षेत्र में उनकी अहम भागीदारी हो रही है ।ऐसे में उनकी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता का प्रभाव परिवार तथा आगे आने वाली दूरी पर दिखाई देता है अतः महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज का दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना होगा क्योंकि समाज में महिला सशक्तिकरण के कितने भी प्रयास किए जाएं उनके अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के बिना संभव नहीं है अतः घर परिवार को संभालने की जिम्मेदारी महिला व पुरुष दोनों को निभानी होगी साथ ही उनके साथ सामंजस्य पूर्ण व्यवहार कर समाज में सुरक्षित वातावरण सम्मान पूर्ण व्यवहार करने से उनकी मानसिक स्थिति को ठीक किया जा सकता है ।इसके अलावा आपसी संवाद ,सेवा भावना ,सहयोग, संवेदना व प्यार से महिलाओं की मानसिक अवस्था को ठीक करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया जा सकता है।
— डॉ. पूर्णिमा अग्रवाल
