ग़ज़ल
निकल आऐ कोई रिश्ता वहीं से,
किसी को देखिए छूकर कहीं से।
ये लम्बा फ़ासिला कम कीजिए कुछ,
नज़र आते नहीं हैं सब यहीं से।
कोई तो एक तेरे साथ होगा,
कि मत घबराना तू सबकी नहीं से।
कि जिसने इसकी जानिब फिर से देखा,
मौहब्बत हो गई उसको ज़मीं से।
सने हैं हाथ उसके मिट्टी से तो,
पसीना पौंछ दे उसकी जबीं से।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
