लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 28)
भरत जी द्वारा श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में चौदह वर्षों तक अयोध्या का शासन सँभालना स्वीकार करने के बाद श्री राम ने वहाँ आये हुए जनसमुदाय, गुरु वशिष्ठ जी, मंत्रीगण तथा दोनों भाइयों का यथायोग्य सत्कार करके उन्हें विदा किया। विदा लेते हुए सभी के गले रुँधे हुए थे। सभी मातायें दुःख के कारण रो रही थीं। तीनों माताओं ने फिर रोते हुए उनको गले से लगाया। श्री राम ने उनको बारी-बारी से चरण स्पर्श करके प्रणाम किया और फिर रोते हुए अपनी कुटिया के भीतर चले गये।
उनसे विदा लेकर सभी अयोध्यावासी पैदल ही उस स्थान तक आये, जहाँ उन्होंने अपनी सेना को रोक दिया था। वहीं पर उनके वाहन भी खड़े हुए थे। भरत जी श्री राम की चरणपादुकाओं को अपने मस्तक पर रखकर प्रसन्नतापूर्वक अपने रथ पर जा बैठे। उनके साथ शत्रुघ्न जी भी बैठ गये। वशिष्ठ, वामदेव, जाबालि आदि ऋषि और मंत्री तथा सभी माताएँ अपने-अपने वाहनों में आगे-आगे चले। उनको मंदाकिनी नदी पार करने की आवश्यकता नहीं हुई, क्योंकि श्री राम का आश्रम नदी के इस पार ही था।
शीघ्र ही वे सभी चित्रकूट की सीमा से बाहर निकलकर अयोध्या की ओर चलने लगे। चित्रकूट से थोड़ी ही दूर जाने पर भरत जी ने वह आश्रम देखा, जहाँ महर्षि भरद्वाज रहते थे। महर्षि भरद्वाज का मुख्य आश्रम तो प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम के निकट था, परन्तु एक अन्य आश्रम उन्होंने यमुना के पार चित्रकूट की सीमा से बाहर भी बना रखा था, जहाँ वे कभी-कभी जाया करते थे। भरत जी के अपने दल के साथ चित्रकूट की ओर जाने पर वे भी उस आश्रम में इसलिए आ गये थे कि श्री राम और भरत जी के मिलन का समाचार उनको यथाशीघ्र मिल जाये।
जैसे ही एक शिष्य ने उनको यह सूचना दी कि राजकुमार भरत श्री राम से भेंट करके लौट रहे हैं, तो उनके समाचार जानने के उद्देश्य से उन्होंने भरत जी के पास सन्देश भेज दिया कि मुझसे मिलकर ही अयोध्या जाना। यह सन्देश पाकर भरत जी प्रसन्नता से उनके आश्रम में आ पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने महर्षि को दंडवत प्रणाम किया। ऋषि भरद्वाज ने उनको उठाकर गले से लगाया। भरत जी के वहाँ आने पर उनको बहुत प्रसन्नता हुई।
भरत जी का आवश्यक सत्कार करके उन्होंने पूछा- “तात! क्या तुम्हारा कार्य सफल हो गया? क्या श्री राम से तुम्हारी भेंट हुई?” इस पर भरत जी ने कहा- “हाँ, ऋषिवर! हमारी श्री राम से भेंट हो गयी। वे हमसे बड़े स्नेह से मिले। लेकिन अयोध्या लौटने का हमारा अनुरोध उन्होंने स्वीकार नहीं किया। श्री राम अपने वचन पर दृढ़ रहने वाले हैं और पिताजी की आज्ञा के पालन के लिए पूरे चौदह वर्ष वन में रहने के लिए कृतसंकल्प हैं।
मैंने उनसे यह अनुरोध भी किया था कि आपके स्थान पर मैं स्वयं चौदह वर्ष तक वन में निवास कर लूँगा और आप अयोध्या का शासन करें, परन्तु यह प्रस्ताव भी उनको स्वीकार नहीं हुआ।
अन्त में मेरे और सभी ऋषियों के अनुरोध पर उन्होंने यह स्वीकार कर लिया कि वे चौदह वर्षों तक वनवास करेंगे और तब तक मैं उनके प्रतिनिधि के रूप में अयोध्या का शासन सँभालूँगा। वनवास पूरा करके लौटने पर वे अयोध्या का राज्यसिंहासन स्वीकार कर लेंगे। इसलिए मैं उनकी आज्ञा पाकर अयोध्या लौट रहा हूँ। मैं प्रतीक के रूप में उनकी चरणपादुकाओं को अपने साथ ले जा रहा हूँ। मैं इनको ही सिंहासन पर रखकर राज्यकार्य का संचालन करूँगा।”
यह सुनकर महर्षि भरद्वाज जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने श्री राम और भरत जी की भी बहुत प्रशंसा की और उनको अपने आशीर्वाद दिये। फिर भरत जी उनके चरण स्पर्श करके उनकी आज्ञा लेकर चल पड़े। कुछ समय बाद ही वे सभी यमुना नदी के किनारे पहुँच गये। उस समय तक संध्या हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने यमुना के किनारे ही रात्रि विश्राम करने का निश्चय किया। शीघ्र ही सभी के लिए वहाँ यथायोग्य व्यवस्था कर दी गयी और उन्होंने सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद शु. 12, सं. 2082 वि. (4 सितम्बर, 2025)
