ग़ज़ल
सोच-विचार धराशायी है
काल कराल आततायी है
जग से अपनेपन के बदले
मात्र वेदना ही पायी है
निरुद्देश्य-सी घोर उदासी
मानसतंत्री पर छायी है
हृदय बहुत है भारी भारी
पत्थर पर चिकनी कायी है
अपनी करनी भोग रहा हूँ
कौन भला उत्तरदायी है
मेरी प्रेम कामना मुझको
इस बीहड़ में ले आयी है
भाव सभी हैं आहत मेरे
हरेक शब्द अब विषपायी है
— कैलाश मनहर
