गीतिका/ग़ज़ल कैलाश मनहर 28/03/202628/03/2026 ग़ज़ल टूट रहा है भीतर भीतरशंकाओं में घिरा हुआ घर फूलों को है याद अभी तक,भँवरे का दिल तितली के पर Read More
गीतिका/ग़ज़ल कैलाश मनहर 04/09/202504/09/2025 ग़ज़ल सोच-विचार धराशायी हैकाल कराल आततायी है जग से अपनेपन के बदलेमात्र वेदना ही पायी है निरुद्देश्य-सी घोर उदासीमानसतंत्री पर छायी Read More
गीतिका/ग़ज़ल कैलाश मनहर 02/06/202502/06/2025 ग़ज़ल वक़्त के हाल-चाल शैतानीशिकारियों के जाल शैतानी अज़ब है खेल ये सियासत काकामयाबी कमाल शैतानी क़त्ल होता है जिसमें बंदों Read More
गीतिका/ग़ज़ल कैलाश मनहर 08/05/202508/05/2025 ग़ज़ल अँधेरी रात और जंगल से .गुज़रना मेराकोई इंसान जो मिल जाये तो डरना मेरा कभी चढ़ाइयाँ चढ़ना ये काली घाटी Read More
लघुकथा कैलाश मनहर 04/06/202205/06/2022 विचार अँधेरा गहराता जा रहा था और पाँवों के नीचे जो सीलन और कीचड़ था वह दरअस्ल खून-माँस था और चीखें Read More
भाषा-साहित्य कैलाश मनहर 04/06/202205/06/2022 कविता के बारे में (एक) ———- कविता की रचना-प्रक्रिया में जो कवि अपने समय से निरपेक्ष बने रह कर लिखने की कोशिश करता है Read More
गीतिका/ग़ज़ल कैलाश मनहर 03/06/2022 गीतिका वक़्त वाक़ई है बुरा या सिर्फ़ मुझको लग रहा है मैं पड़ा हूँ उसके पीछे वक़्त आगे भग रहा है Read More