कविता

विकास और विनाश

जहां उन्नति की आवश्यकता थी
वहां के विकास के बारे में हमने
एक बार भी नहीं सोचा,
जब जहां जिस जगह को पाया
बुरी तरह से हमने नोचा,
किसी की जगह छीनना ही हमें आया,
तो बताइये उन जरूरत वालों ने क्या पाया,
हमने छीन ली थेथरई से सारा जंगल,
कई पीढ़ी तक किये मंगल,
आज रो रहे हैं कि हिंसक जानवर
हमारे घरों तक बेधड़क आ जा रहे हैं,
मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
ये सब अपना मूल रहवास खोजते आ रहे हैं,
इस प्रकृति की खुले गोद में
स्वच्छंद खेलती रहती थी प्यारी नदियां,
जिन पर चलने की नहीं थी पाबंदियां,
पर हम इंसानों ने एक नया शब्द खोजा विकास,
बसाने लगे शहर छीन उसके रहवास,
नदियों को अपने तटीय इलाकों की
पड़ी जरूरत तो निकल पड़े ले सैलाब
तब हम उसे कहने लगे महाविनाश,
हम कितने स्वार्थी हो गए,
प्रकृति को लूट लूट शहरों में खो गए,
शहरीकरण की कीमत भुगत रहे गांव,
बहा रही पानी पेड़ और उनके छांव,
हम अभी भी अपनी करनी किए जा रहे हैं,
अपने विनाशकारी कार्यों को विकास बता रहे हैं।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554