गीत/नवगीत

नहीं कोई है अपना यहाँ पर, कोई नहीं पराया है

साथी है जो साथ में चलता

साथी है जो साथ में चलता, गीत प्रेम का गाया है।

नहीं कोई है अपना यहाँ पर, कोई नहीं पराया है।।

अपना तो जीवन है भटकन।

आभूषण बन जाता लटकन।

आभूषण तो लुटते रहते,

वर्तमान में जीता बचपन।

कोई क्या हमको लूटेगा? खुद ही खुद को लुटाया है।

नहीं कोई है अपना यहाँ पर, कोई नहीं पराया है।।

अगले पल का पता नहीं है।

खुद को खोया, लुटा नहीं है।

भविष्य को तुम क्या जिओगे?

वर्तमान तो जिया नहीं है।

जहाँ हो, जिसके साथ हो, जीओ, जो पल पाया है।

नहीं कोई है अपना यहाँ पर, कोई नहीं पराया है।।

अपने बनकर, हमको लूटा।

अब तो सबका, साथ है छूटा।

नहीं प्रेम है, नहीं है बंधन!

खुल गए बंधन, टूटा खूँटा।

यात्रा ही गंतव्य हमारा, राह ने साथ निभाया है।

नहीं कोई है अपना यहाँ पर, कोई नहीं पराया है।।

डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जवाहर नवोदय विद्यालय, मुरादाबाद , में प्राचार्य के रूप में कार्यरत। दस पुस्तकें प्रकाशित। rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in मेरी ई-बुक चिंता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो शिक्षक बनें-जग गढ़ें(करियर केन्द्रित मार्गदर्शिका) आधुनिक संदर्भ में(निबन्ध संग्रह) पापा, मैं तुम्हारे पास आऊंगा प्रेरणा से पराजिता तक(कहानी संग्रह) सफ़लता का राज़ समय की एजेंसी दोहा सहस्रावली(1111 दोहे) बता देंगे जमाने को(काव्य संग्रह) मौत से जिजीविषा तक(काव्य संग्रह) समर्पण(काव्य संग्रह)