कहर प्रकृति का बना हुआ
कहर प्रकृति का बना हुआ है, देख लीजिए आज।
दोहन हमनें यहाॅं किया है, लूट धरा की लाज।।
पेड़ काट कर करी कमाई, विपिन किये सब साफ।
बदतर हमने खनन किया है, नहीं करेगी माफ।
धूमिल हमने श्रृंगार किया, छीन शीश का ताज।
कहर प्रकृति का बना हुआ है, देख लीजिए आज।
विस्फोट किया सीना चीरा, करते खूब विकास।
दरक गये सब पहाड़ देखो, होता आज विनाश।
हुआ जलजला जनता चीखी, संकट में है राज।
कहर प्रकृति का बना हुआ है, देख लीजिए आज।
नोच रहा था सीना कब से, करी धरा बेहाल।
राजनीति के खेल खेल कर, बहुत कमाया माल।
बहुत चेताया हठी बना यह, आया कब है बाज़।
कहर प्रकृति का बना हुआ है, देख लीजिए आज।
अब भी समझो मानव पगले, बहुत लिए दुख झेल।
लाज बचाओ धरती मां की, कुदरत से मत खेल।
पेड़ लगाओ प्रकृति बचाओ, नहीं गिरेगी गाज।
कहर प्रकृति का बना हुआ है, देख लीजिए आज।
— शिव सन्याल
