किस बात है गिला
अपनों से ही किया करते हैं वो शिकवा,
हमें ना पता उनको किस बात है गिला।
ना जाने कब से चल रहा है सिलसिला,
जब कोई बात कहें वो जाते तिलमिला।
वजह कोई हो तो हमें आज ही बताओ,
बात करना गुनाह है? इतना न सताओ।
गर तुम्हें कोई ग़म हैं जिक्र तो फरमाओं,
यूं अपना समझों तो विस्तार से बताओ।
गुरूर का पर्दा फिर एक बार तो गिराओ,
कितना सम्मान मिलता है लुफ्त उठाओं।
क्या? रखा है इस अहम में जरा बताओ,
जिंदगी कितनी हँसीं है मजे भी उड़ाओ।
— संजय एम तराणेकर
