सच्चा श्राद्ध
हर साल लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि करते हैं। मैं उनसे कुछ पूछना चाहती हूँ? श्राद्ध क्या हैं? वह जो मृत्यु उपरांत होता है।
जो जीते जी इंसान की कद्र न करे, मरणोपरांत 56 भोग लगाओ, कुछ भी कर लो, आत्मा कभी संतुष्ट नहीं होगी, क्योंकि माँ-बाप की बद्दुआएं तो वे जीते जी ले लेते हैं। स्वयं बताएं, तो कैसे वह आत्मा उसे दुआएँ देगी? वे औलादें कभी सुःखी नहीं रह पाएंगी, जिसने जीते जी आत्मा दुखा दी हो।
फिर मृत्यु पश्चात श्राद्ध हवनादि करने से, किसी अन्य/ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा आदि देने से, उनकी आत्मा तृप्त कैसे होगी? यकीनन नहीं! क्योंकि जब अपनों से आत्मा की तृप्ति नहीं हुई, तो बाहर के शख्स से कैसे होगी? चलो मान भी लें, तो ये सब उस आत्मा तक पहुंचेगा कैसे? क्योंकि ये मुमकिन नहीं! सिर्फ़ ये हमारा अंधविश्वास ही हैं, जो हम पशु-पक्षियों को खिलाना, अपनी संतुष्टि के लिए करते हैं, आत्मा के प्रकोप, बद्दुआ, ड़र आदि के कारण।
फिर मृत्युपरांत कैसे संतुष्टि हो सकती है? मेरा मानना है कि हम मरने वाले के किसी करीबी प्रिय व्यक्ति, पुत्र-पुत्री आदि को दान दे सकते हैं, क्योंकि हर किसी का, किसी न किसी से (आत्मीय जुड़ाव) अवश्य होता हैं। कोई भी शख्स, जिससे वह संतुष्ट हो, उसे दे। या किसी जरूरतमंद को देना भी उचित होगा, ठीक वैसे ही जैसे किसी भूखें-प्यासे व्यक्ति को भोजन करवाने से उसकी आत्मा की तृप्ति होती हैं और वह इंसान दुआएं दे जाता हैं।
बेशक! आप आत्मा की संतुष्टि के लिए कुछ भी करें। किंतु मेरा मानन हैं कि जीतेजी का ही इंसान हैं। मृत्यु पश्चात कौन लौटकर आया है? इसलिए जीते जी कद्र, सेवा-पानी कर लो, जिससे इंसान की आत्मा संतुष्ट हो; इस संसार से मुक्त हो, आत्मा की तृप्ति हो सके, सही मायने में यही सच्चा श्राद्ध होगा।
— रीना सिंह (रचना)
