माँ
जब जाना होगा उस माँ ने
कि जा रहा है बेटा सरहद पर
तो कितनी ही रातें वो करवट बदल बदल कर सोयी होगी
बात देश की आन बान और शान की है
बस इसी ख़ातिर वो अपने बेटे के आगे कहाँ रोई होगी
घर के आँगन में कौने में बैठी वो पत्नी
मन में उमड़ती संवेदनाओं को दबा कर
अनजानी बेचैनी में खोयी होगी
जाने दोबारा मिलना होगा भी या नहीं
यह सोच कर
जाने कितनी ही बार पलकें डुबोई होंगी
कुछ दिनों बाद अचानक से बंद हो गया होगा
जब सारा communication
ना आया होगा कोई फ़ोन कॉल
और ना मिली होगी कोई इनफार्मेशन
जाने कितनी कल्पनायें उसके मन ने पिरोयी होंगी
और फिर एक दिन अचानक
छा गया होगा घना अँधेरा
उस बूढ़ी माँ और चीर प्रतीक्षित पत्नी के जीवन में
जब देखी होगी तिरंगे में लिपटी सूरत
आख़िर हम तो कल्पना भी नहीं कर सकते
जितना हम जीवन भर नहीं रोते
उस से भी ज़्यादा
उस परिवार की आँखें चंद मिनटों में रोई होंगी
चंद मिंटो में रोई होंगी
