डांडिया का असली रंग
डांडिया का असली रंग-भाग 1
शहर में डांडिया उत्सव का बुख़ार अपने चरम पर है। नवरात्रि के नौ दिन मानो मस्ती और धमाल के ऐसे तेवर लिए हुए हैं कि तापमान गर्मी के नौ तपों से भी कहीं अधिक प्रतीत हो रहा है। कई संस्थाएँ तो केवल डंडे बजाने के लिए ही अस्तित्व में आई लगती हैं। बाज़ार सज चुके हैं—डांडिया और गरबा के रंग-बिरंगे सामान से। जितना गरबा गुजरात में पूरे नौ दिन में खेला जाता है, उससे कहीं अधिक तो हमारे शहर में एक ही दिन में खेल लिया जाता है।
पुरुषों ने दीवाली की साफ़-सफ़ाई को कुछ दिनों के लिए आगे खिसका दिया है—बिलकुल उसी तरह जैसे दफ़्तर में राखी बिना सिफारिश वाली फ़ाइल को कोने में सरका दिया जाता है। महिलाओं ने झाड़ू-बर्तन छोड़ दिए हैं और डांडिया पकड़ लिए हैं। पति जैसे प्राणी भी पत्नियों के साथ ताल में ताल मिलाकर डंडे बजवा रहे हैं… जी हाँ, ‘बजवा’ रहे हैं—बजाने की तो क्या मजाल!
होली की मादकता से कहीं अधिक गरबा अपने जवां, गबरीले जोश से दिल बहला रहा है।
अपनी जासूसी खिड़की से पड़ोसी शर्मा जी को देख रहा हूँ। सुबह-सुबह वे अपनी पत्नी के साथ डंडे बजाने में व्यस्त हैं। आज तो मेरा अख़बार भी उधार ले जाना भूल गए। शर्मा जी ठहरे कंजूस प्रवृत्ति के, इसलिए डांडिया खरीदने की बजाय बेलन से काम चला रहे हैं। और उनकी पत्नी—बेलन चलाने में तो वैसे भी माहिर हैं… मेरी नहीं…जी, ऐसा ‘मेरी वाली’ ने कहा है लिखने को। मेरा लिखा पहले संपादक के पास नहीं, बल्कि मेरी पत्नी की केंची की धार से होकर गुजरता है। कुछ अनचाहे, मनगढ़ंत, फिज़ूल की तुर्रमख़ाँ शब्दावली पर बाद में डाँट न पड़े, इसलिए पहले ही काम हल्का कर रहा हूँ।
ख़ैर, बात हो रही थी शर्मा और शर्मिन की—दोनों का कोऑर्डिनेशन बड़ा शानदार है। शर्मा जी के हाथ में भी बेलन है, लेकिन यहाँ वह ढाल का काम कर रहा है।
शहर की पुलिस भी इन दिनों कुछ ज़्यादा ही डांडिया खेलने के मूड में है। ट्रैफ़िक का चौराहा हो या सब्ज़ी मंडी का नुक्कड़—जहाँ भी मौका मिले, पुलिस वाले भी डांडिया का रंग जमा ही देते हैं।
हमारे पास भी एंट्री पास आया है—कूपन का हज़ार रुपये भुगतान करना पड़ा। जुगाड़ तो वीआईपी पास का कर रहे थे…कई जगह पासा फेंका भी…लेकिन चला नहीं। श्रीमती जी को सौदा थोड़ा महँगा लगा, क्योंकि डंडे कुल मिलाकर साठ रुपये के हैं। डांस भी हमें ही करना था—इतने बड़े आदमी भी नहीं बने कि कोई हमारी जगह डंडे बजा दे।
खाने के मेनू का हिसाब लगाया—मुश्किल से दो सौ रुपये का खा पाएँगे। कूपन देने वाला कह रहा था (कमबख़्त बड़ा हरामी है)—”इस बार आगरे की स्पेशल रसमलाई भी है, सर!”…उसे मालूम है कि मुझे डायबिटीज है। खैर, जले पर चीनी छिड़कने का पुराणकालीन रिवाज तो है ही!
तो फिर बाकी आठ सौ रुपये…? नहीं बाबा, लूट मचा रखी है… नहीं जाएँगे!
श्रीमती जी ने साफ़ मना कर दिया, लेकिन मैंने कुछ सरकारी आँकड़ों की हेराफेरी और आश्वासन की मीठी गोली देकर उन्हें मना ही लिया। बताया कि वहाँ कुछ बम्पर लॉटरी प्राइज भी हैं—जैसे ‘बेस्ट कपल डांस’, ‘लकी ड्रॉ’। इसलिए क्यों न भाग्य आज़मा लिया जाए—शायद देवी माँ की कृपा हो जाए।
जी, पहुँच गए कार्यक्रम में। वहाँ चार मुस्टंडे अंगरक्षक हमारे स्वागत हेतु उपस्थित थे। कूपन को गौर से देखा, हमें गिना, हमारी बीबी को गिना, चार बार गिना—जब पूरी तरह आश्वस्त हो गए कि हम केवल दो ही हैं, तब भीतर जाने दिया।
आयोजक मंडल मंच से कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बता रहा था। जो बात बार-बार सुनाई दी, वो यही कि—यह सब प्रायोजकों की धनराशि की बदौलत है कि तुम भुखमरों को यह गरबा नसीब हुआ है, वरना तुम्हारी औकात नहीं थी इस गरबा में आने की!
सम्मानित अतिथियों की पूजा-अर्चना की गई… उनके प्रतिष्ठानों की आरती हुई… झालरें और शंख बजे। उद्घोषक पूरे जोश में प्रायोजकों के नाम पुकार रहे थे, मानो आवाज़ उनके घर तक पहुँचनी चाहिए—”आपका नमक खाया है, सरदार! तो बजाने तो पड़ेगी ही न!”
उद्घोषक महोदय इतने भावुक हो गए कि गला रुंध गया। नीचे खड़े लोग आयोजकों और प्रायोजकों दोनों को ही अपनी-अपनी शैली में खानदान की मात्र भगिनी एकीकरण में शामिल करने लगे। तब उद्घोषक को होश आया—गला साफ़ किया और माँ जगदम्बा की आरती के लिए अतिथियों का आव्हान किया।
देवी की मूर्ति के समक्ष अतिथि आरती कर रहे थे, ताकि कार्यक्रम विधिवत प्रारंभ हो सके। इस बीच प्रतिभागी डंडे बजाने की तैयारी में जुट चुके थे—मंच के पीछे लगी स्टॉलों पर कुछ-कुछ खा-पीकर, कुछ एडवांस में अपनी जेब में दोने और कागज़ों में भर कर लौट रहे थे।
डांडिया का असली रंग – भाग दो
आयोजकों ने सबको गरबा खेलने के लिए आमंत्रित किया। मंच से उद्घोषणा हुई—“अब सभी प्रतिभागी मैदान में आएँ!” सब मैदान में आ चुके थे, ताल से ताल मिलाने की तैयारी में डूबे। लेकिन एक नेताजी किस्म के अतिथि महोदय कुर्सी से उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उन्हें डर था कि कहीं पीछे से कोई उनकी कुर्सी खिसका न ले, या फिर कोई और उस पर विराजमान न हो जाए। बाद में पता चला कि ये दूध के जले हुए हैं जो अब छाछ भी फूँक-फूँक कर पीते हैं।
दरअसल, हाल ही में ये नेताजी अपनी पूर्व पार्टी से अनुशासनात्मक कार्यवाही के चलते निष्कासित हुए हैं और अब किसी दूसरी पार्टी में जुगाड़ बिठा रहे हैं। बड़ी मुश्किल से यहाँ आयोजकों से सिफारिश कर एक ‘कुर्सी’ मिली है, अब उसे गंवाना नहीं चाहते। अफ़वाह तो यह भी है कि इन्होंने आयोजकों से यह तक कह दिया है—”अगर गरबा में हिस्सा न लूँ, तो कम से कम यह कुर्सी तो घर तक भिजवा ही देना।”
एक अन्य अतिथि बार-बार अपना साफ़ा सँभाल रहे थे, लेकिन साफ़ा है कि सर से उतर-उतर कर उनके चरणों में गिरता ही जा रहा था। दो बार तो वे उसे सम्मान सहित उठा भी लाए, लेकिन तीसरी बार जैसे ही झुके, किसी अति उत्साही डांडियारत प्राणी का पैर उनके हाथ पर पड़ गया। कराह उठे! साफ़े की चूनरी खुल गई, और ऐसा प्रतीत हुआ मानो अतिथि महोदय सरेआम नग्नता के कगार पर पहुँच गए हों।
कार्यक्रम में नाचते-गाते, मस्ती में डूबे कुछ रहमदिल इंसानों ने उन्हें उठाने की कोशिश की, लेकिन दृश्य देखकर चौंक उठे—अतिथि महोदय फर्श पर ही नागिन डांस की मुद्रा में नाच रहे थे! जब तक सर पर साफ़ा होता है, आदमी को अपनी इज़्ज़त संभालनी पड़ती है; जैसे ही वह सर से उतरा, आदमी की असली औक़ात खुद-ब-खुद बाहर आ जाती है।
आयोजकों ने स्थिति को भाँप लिया था, लेकिन वे भी इनसे नज़रें चुराते घूम रहे थे, क्योंकि इन अतिथि महोदय से वे लिफ़ाफा पहले ही ले चुके थे।
हम भी कभी महफ़िल को, और कभी अपने कुरते की जेब में ठुँसे पड़े डांडिया स्टिक्स को देखते रहे—सोचते रहे, “बजाया जाए या नहीं?” लेकिन बजाएँ भी तो किसके साथ? जो हमें पकड़ कर लाई थीं—मतलब हमारी श्रीमती जी—उन्हें उनकी सहेलियों ने पकड़ रखा था। वे वहीं व्यस्त थीं—बिलकुल संसद में विपक्ष को स्पीकर पकड़ ले, वैसा दृश्य! और उनकी सहेलियों के पति—अपने-अपने डांडिया सँभालते हुए खाने की स्टॉल की ओर बढ़ चुके थे, ताकि कूपन के कुछ पैसे कैश कर सकें।
मैं मायूसी से अपनी डांडिया स्टिक्स देख ही रहा था कि तभी एक संपादक महोदय दिखे। उनके साथ चार लेखक भी थे, जो उनके साथ गरबा खेलने की असफल कोशिश कर रहे थे। संपादक महोदय कुछ खिन्न से लग रहे थे, जैसे गरबा उन्हें सृजनात्मक विपत्तियों का केंद्र लग रहा हो।
सभी लेखक उन्हें अपने डांडिया दिखा रहे थे। वे डांडिया को हाथ में लेकर देखते, परखते और फिर लौटा देते—“खेद है…” की मुद्रा में। मैंने भी अपनी डांडिया स्टिक्स उन्हें दिखाईं, लेकिन उन्होंने दूर से ही हाथ हिलाकर कहा—“खेद है, मैं नहीं खेल पाऊँगा!”
उधर कई डॉक्टर—जो मुझसे कहीं बेहतर डॉक्टरी करते हैं—भी मौजूद थे। लेकिन वे डांडिया बीच में ही छोड़ चुके थे। कुछ तो मजबूरी में, कुछ आदतन, किसी का घुटना, किसी की जुबान, किसी का गला, तो किसी की कमर जाँचने में लग गए थे। वहीं खड़े-खड़े वे पेपर नैपकिन पर दवाइयाँ भी लिख रहे थे—जो बाद में गरबा नृत्य की पसीने भरी बूंदों के साथ बहते-बहते लोगों के गालों पर चिपक जा रही थीं।
कुछ अवसरवादी मरीज नाराज़ भी दिखे। उन्हें लग रहा था—”डॉक्टर लोग यार, इतना भी मेडिकल एथिक्स नहीं रखते! पहली बात तो ये कि डांडिया कोई डॉक्टरों के खेलने की चीज़ है क्या? और चलो आ भी गए तो इन्हें डांडिया स्टिक पकड़ते हुए शोभा देता है क्या? इन्हें तो अपना आला (स्टेथेस्कोप) साथ लाना चाहिए था।”
आख़िरकार, एक डॉक्टर, हमेशा डॉक्टर ही होता है।
शहर की पुलिस भी वहाँ मौजूद थी, हालाँकि उन्हें कार्यक्रम में औपचारिक रूप से आमंत्रित नहीं किया गया था। वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उपस्थित थे—या शायद यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई कानून हाथ में न ले… ताकि वे भी डांडिया खेल सकें।
कुछ नवयुवक भी नज़र आए, जो कुर्ता-पायजामा जैसे पारंपरिक वस्त्रों में फँसे हुए लग रहे थे—जबरन गरबा के इस जाल में धकेले गए। उनमें से ज़्यादातर की गोद में बच्चे थे—बिलकुल होमली फीलिंग का अनुभव कर रहे थे। उनके डांडिया स्टिक्स उनके बच्चों ने पकड़ रखे थे, जो इन पापा जैसे प्राणियों के गालों पर डंडा बजाकर कह रहे थे—“हैप्पी डांडिया पापा!”
और उनकी पत्नियाँ? वे तो पंडाल में दूसरों के गालों पर डांडिया बजा-बजाकर हैप्पी डांडिया खेल रही थीं!
डांडिया का असली रंग – भाग तीन
अब तक इस रनभूमि में डांडिया लेकर कूदने का सारा जोश हमारा काफ़ूर हो चुका था। हमने अपने डांडिया फिर से अपने कुरते की तुणीर में खोंस दिए। इतने में पड़ोस के शर्मा जी आ गए। बोले, “गर्ग साहब, कैसे यूँ चुपचाप खड़े हो?”
मैंने सहजता से कहा, “नहीं… मुझे खेलना आता नहीं है।”
इससे पहले कि शर्मा जी कोई और करुणा भरा संवाद बोलते, मैंने एक दूसरा प्रश्न दाग दिया—ठीक निशाने पर—
“अरे! आप तो रोज़ प्रैक्टिस करते हैं, फिर क्यों नहीं खेल रहे?”
वो बोले, “गर्ग साहब… डांडिया तो चलता रहेगा… इसमें कुछ नहीं रखा। सब इन आयोजकों का घालमेल है… स्साले साल भर की दाल-रोटी निकाल लेते हैं एक ही आयोजन में। वो देखो, अभी खाने की स्टॉल थोड़ी खाली है। बाद में यहाँ भीड़ हो जाएगी। डांडिया का क्या है… घर पर ही बचा-खुचा खेल लेंगे। लेकिन अगर खाना नहीं मिला, तो फिर घर पर तो मिलने से रहा… ये तो पक्का है। चलो, आप भी चलिए।”
मैंने विनम्रता से उत्तर दिया—“नहीं… आप खा लीजिए। मुझे श्रीमती जी का इंतज़ार करना है। साथ ही खा लेंगे—बस थोड़ी ही देर में वो फ्री हो रही हैं।”
फिर उन्होंने अपने डांडिया मुझे पकड़ाते हुए कहा—
“थोड़ी देर मेरे डांडिया संभाल लेना।”
मैंने उनके डांडिया एक कुर्सी के पास रख दिए और वहीं खड़ा हो गया।
थोड़ी देर में देखा तो दस और लोग अपने-अपने डांडिया लेकर चले आए। दरअसल वे भी कोई मुझ जैसा ही निठल्ला प्राणी ढूँढ रहे थे, जो उनके डांडिया संभाल सके।
अब दृश्य ऐसा बन चुका था मानो मंदिर के बाहर जूते-चप्पल रखने का स्टॉल खोल लिया हो। बस एक ही डर था—कोई टोकन व्यवस्था नहीं थी।
कल को यदि किसी के डांडिया किसी और के हाथ में दिख गए, तो मेरे ऊपर डांडिया गबन का संगीन आरोप लग सकता है! हो सकता है आयोजक मेरे विरुद्ध कोई जांच समिति बिठा दें—ईडी या सीबीआई जैसी कोई संस्था। वैसे भी, ये दोनों कब किसे धर-पकड़ लें, कहना मुश्किल है।
कुछ समय बाद आयोजक भी अतिथियों को निपटा कर पंडाल में कूद पड़े। सभी कैमरों की निगाहें, जो अब तक केवल और केवल महिला शक्ति पर केंद्रित थीं, अब आयोजकों की ओर मुड़ गईं। आखिर भुगतान तो आयोजकों से ही लेना था—सौंदर्य दर्शन एक ओर… धंधा दूसरी ओर।
इसी बीच एक आयोजक महोदय का डांडिया किसी महिला के वस्त्रों के भीतर ऐसी जगह जा घुसा, जिसका वर्णन इस साहित्य को थोड़ी अलग दिशा में ले जाएगा…
वैसे आप समझदार हैं, आप समझ ही गए होंगे… साहित्य में क्षेपक डालना ज़रूरी तो नहीं, है न?
बड़ा हल्ला-गुल्ला मच गया। थोड़ी ही देर में डांडिया की इस कारस्तानी की खबर पूरे पंडाल में आग की तरह फैल गई।
अब सभी लोग अपने-अपने डांडिया छोड़कर उस फँसे हुए डांडिया को निकालने में जुट गए। किसी ने सलाह दी—“लाइट बंद कर दो!” तुरत-फुरत लाइट बंद की गई। तब जाकर कहीं डांडिया सुरक्षित रूप से निकाला गया।
पर अंधेरे का फ़ायदा उठाकर कुछ शरारती तत्वों ने यहाँ-वहाँ जहाँ भी मौका मिला, हाथ साफ़ कर लिया। अंधेरे में ही…
“चाटाक्क्क!”
“पटाक्क्क!”
…की आवाज़ें गूँजने लगीं।
जैसे ही लाइट जली, तो पता चला कि दो गुट बन चुके हैं, और पूरे मैदान में असली डांडिया शुरू हो चुका है।
अब डांडिया केवल स्टिक से नहीं, बल्कि हाथ, पैर, मुँह, फर्नीचर, माइक, कैमरा, माला… जिसे जो हाथ लगा या कबाड़ा जा सकता था, उसी से डांडिया शुरू कर दिया गया।
पुलिस वालों ने भी मौके का लाभ उठाते हुए अपने डंडे चलाने शुरू कर दिए।
अब… असली डांडिया का मज़ा आ रहा था!
मुझे मजबूरी में डांडिया स्टिक्स की रखवाली छोड़नी पड़ी, क्योंकि तब तक डांडिया और उसके ऊपर रखी कुर्सी मैदान-ए-जंग में जा चुकी थी।
अब मैं अपनी श्रीमती जी को ढूँढ रहा हूँ… और स्टाफ को कह दिया है कि एक ब्रेड का पैकेट ले आए।
क्योंकि अगर घर जाकर श्रीमती जी से कहूँगा—“कुछ बना दो…”
तो जो डांडिया फिर घर पर चलेगा, उसका मुकाबला तो यहाँ वाला डांडिया भी नहीं कर सकेगा!
— डॉ. मुकेश असीमित
