गाँव और बचपन की स्मृतियाँ,
मनुष्य चाहे कितना ही आधुनिक क्यों न हो जाए, उसका हृदय बार-बार उस भूगोल की ओर लौटता है जहाँ उसने अपनी पहली साँस ली थी, जहाँ बचपन के सपनों ने आकार लिया था। मेरे लिए वह स्थान है—गाँव। मिट्टी की उस सोंधी खुशबू से शुरू होती स्मृतियाँ, आज भी आत्मा के साथ गहराई में जुड़ी हुई हैं।गाँव का जीवन सरल और सहज था। सुबह मुर्गे की बाँग से दिन की शुरुआत होती और खेत-खलिहानों की हरियाली मन को ताजगी देती। बैलगाड़ियों की चरचराहट, कुएँ से रस्सी खींचने की आवाज़, और बच्चों की हँसी-मज़ाक से पूरा वातावरण जीवंत हो उठता। यही वह दुनिया थी, जिसमें बचपन के सुनहरे दिन बीते और जीवन की पहली सीखें मिलीं।गाँव की आत्मा थे वहाँ के बुजुर्ग। दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-ताऊ सभी की उपस्थिति घर को पूरा बनाती थी। उनकी कहानियाँ—चाहे पंचतंत्र की हो, इतिहास की गाथा हो या गाँव के वीरों की स्मृति,हमारे व्यक्तित्व को गढ़ने वाली धरोहर थीं। उनके अनुभव जीवन की कठिनाइयों को सहने का बल देते और संस्कारों की गहराई वहीं से प्राप्त होती।गाँव की असली पहचान थे खेत। ऋतु के परिवर्तन के साथ फसलों की हरियाली और सुनहरी बालियाँ आँखों में आज भी झिलमिलाती हैं। धान की रोपाई के समय पानी में खेलते हुए नन्हे पाँव और गेहूँ की कटाई में सबका जुट जाना, श्रम के साथ उत्सव-सा लगता। श्रम और आनन्द का यह संयोग गाँव में जीवन का अभिन्न अंग था।गाँव का जीवन त्यौहारों के बिना अधूरा है। सावन का महीना आते ही घर-आँगन झूलों से सज उठते और तीज पर स्त्रियाँ रंग-बिरंगे वस्त्र पहन कर गीत गातीं, झूमतीं। दीपावली की रात जब घर-घर दीप जलते, तो लगता जैसे पूरा गाँव प्रकाश में स्नान कर रहा हो। होली में रंग और उमंग का ऐसा उत्सव होता कि कोई भेद-भाव शेष न रहता। ये त्यौहार केवल पर्व नहीं थे, बल्कि भाईचारे का जीवंत प्रतीक थे।गाँव का स्कूल मिट्टी की फर्श और खपरैल की छत वाला भले ही साधारण हो, पर वहाँ का वातावरण असाधारण था। गुरुजन अध्यापक से बढ़कर अभिभावक थे। वे डाँटते भी स्नेह से और पढ़ाई के साथ जीवन का अनुशासन भी सिखाते। प्रार्थना सभा की सामूहिक वंदना, तख्तियों पर लिखावट सुधारने का अभ्यास और कक्षा के बाद खेलकूद ने शिक्षा को मनोरंजन में बदल दिया। आज भी वे यादें आत्मा को नम्रता और सरलता की ओर आकृष्ट करती हैं।
बाल्यकाल की सबसे प्रगाढ़ स्मृतियाँ माता-पिता से जुड़ी हैं। पिता की अनुशासनप्रियता और माता का वात्सल्य ऐसा संतुलन था, जिसमें जीवन की नींव पड़ी। दादा-दादी की ममता और भाई-बहनों के साथ छोटी-छोटी खुशियाँ, शरारतें और मेल-मिलाप ने बचपन को रंगीन बनाया। झगड़े भी हुए, रूठना-मनाना भी हुआ, पर हर दिन के अंत में प्रेम ही बंधन को और गहरा करता था।आज जब मैं आधुनिक जीवन की आपाधापी में उलझा हूँ, तब बार-बार मन लौटकर उन्हीं पन्नों को पलटता है। वे गाँव, वे दोस्त, वे खेत-खलिहान, बुजुर्गों के उपदेश, तीज-त्यौहारों का उल्लास, विद्यालय का अनुशासन और परिवार का अटूट स्नेह,ये केवल स्मृतियाँ नहीं, बल्कि जीवन की वह पूँजी हैं जो मुझे कठिनाइयों में भी शक्ति देती हैं।बचपन के वे अनमोल पल आज भी जीवित हैं,यादों की ज्योति बनकर, जो हृदय को गरमाहट देती है और आत्मा को संस्कारों की शक्ति से भर देती है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
