दौलत और समाज का नज़रिया”
जब इंसान के पास पैसा होता है तो उसकी हर बात को लोग बहुत अहम मानने लगते हैं, वही बातें जो पहले लोगों को बेकार या फ़ालतू लगती थीं, दौलत आने के बाद हिकमत और तजुर्बे की तरह समझी जाती हैं, असलियत यह है कि पैसा इंसान का चरित्र और नीयत नहीं बदलता बल्कि लोगों का नज़रिया और रवैया बदल देता है, समाज में अक्सर देखा जाता है कि ग़रीब की राय को कोई अहमियत नहीं दी जाती, उसकी सच्ची बात भी अनसुनी कर दी जाती है लेकिन वही इंसान जब आर्थिक तौर पर मज़बूत हो जाता है तो उसके शब्दों को कीमती सलाह, उसके तौर-तरीक़े को क़ाबिले तारीफ़ और उसके व्यक्तित्व को रोशन चेहरा कहने लगते हैं, तभी तो कहा गया है — “फ़क़्र में सच्चाई दब जाती है, दौलत में झूठ भी सुनहरी लगता है”, इंसान की आदत यही है कि वह ताक़त और दौलत वालों की तरफ़ खिंचता है, जो इंसान ग़रीबी में अनदेखा किया जाता है, वही दौलत मिलते ही सम्मान और तवज्जो का हक़दार बन जाता है, इसमें असली मसला पैसे का नहीं बल्कि समाज की सोच का है क्योंकि अमीर के फ़िज़ूल बोल को भी लोग ध्यान से सुनते हैं और ग़रीब की काम की सलाह को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं, यह भी सच है कि एक अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए पैसा बहुत ज़रूरी है, इसके बिना इंसान की क़ाबिलीयत, शिक्षा और हुनर भी अधूरे लगते हैं, पैसा ही इज़्ज़त, भरोसे और समाज में स्थान दिलाने का ज़रिया बन जाता है, लेकिन असल में इंसान की पहचान उसके अच्छे चाल-चलन और चरित्र से होती है, मगर समाज ज़्यादातर दौलत का पर्दा आँखों पर डालकर ही फैसला करता है और इसीलिए कहा जाता है कि “आर्थिक तौर पर मज़बूत होना सिर्फ़ जेब भरना नहीं बल्कि लोगों के रवैये का बदल जाना है।”
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
