सत्य शील से झंकृत जीवन
भोजन लेते भर-भरकर हम, थाली में।
थोडा खाते बचा फेंकते, नाली में।
व्यर्थ बहाकर पानी करते, नादानी–
कूड़ा करकट अटका रहता, जाली में।।
धरा गगन हो निर्मल पावन, आह्लादी।
पंछी गण झूमे गाये हो, स्वच्छंदी।
सजी रहे नित मानस क्यारी, रंगीली–
हरियाली चहुँ दिश डोले हो, आनंदी।
संसाधन संयोजन चेतन, न्यारा हो।
सृष्टि रूप नित सुंदर अनुपम, प्यारा हो।
लापरवाही मानव मन कमजोरी हैं–
अनुरागी मन फुलवारी का, माली हो।।
शिक्षा का जीवन में नित उजियारा हो।
ज्ञानी गुरुवर का प्रोत्साहन, न्यारा हो।
ध्यान-योग साधन से जीवन, उत्साही–
सत्य शील से झंकृत जीवन, प्यारा हो।।
