कहानी

ठेठ वाले प्रोफेसर

आज रिटायर्ड होने पर कॉलेज के हर तरफ आंसू का सैलाब बह रहा था।
प्रोफेसर साहब चुपचाप ऑफिस में बैठकर अपने रिडायर्ड प्रोग्राम का जायजा ले रहे थे
हर कोई उनके जाने का गम अलाप रहा था।
पूरा ग़मगीन माहौल बन रहा मानो आज समूचा कालेज रो पड़ेगा,
प्रोफेसर साहब के घर पर उनकी पत्नी सुधा और बेटा आपस में प्रोफेसर साहब के रिडायर्ड होने पर दुःख जता रहे थे,
बेटा बोला”पापा घर पर रहेंगे तो सबका जीना दुश्वार कर देंगे,
हर काम में अपनी टांग घुसेड़ देंगे
अभी तक तो कालेज की ड्यूटी पर रहते थे,
कितना शांति रहता था अब कल से घर पर जिंदगी नर्क सी हो जायेगी।
कालेज की सभागार में मंच पर सभी गणमान्य लोग मौजूद थे,
प्रोफेसर साहब के सम्मान में हर कोई मंच पर दो बात कह रहा था वही बगल में प्रोफेसर साहब की आंखों से कब आंसू की बारिश शुरू हो जाये इसकी कोई गारंटी नहीं थी।
प्रोफेसर साहब से सभी आग्रह करने लगे कि आप कुछ कहो तो प्रोफेसर साहब खड़े होकर बोले” मेरे प्यारे बच्चों और स्टॉप आप सभी लोगों से एक प्रश्न पूछ सकता हूं।
भीड़ से आवाज आने लगी सर एक नहीं दस पूछो..
प्रोफेसर साहब बोले “क्या कोई मेरा पूरा नाम बता सकता है?
पूरे सभागार में सन्नाटा छा गया।
मंच पर बैठे गणमान्य लोग एक दूसरे का मुंह देखने लगे।
प्रोफेसर साहब बोले आप सब मुझे डॉ एस के बोलते हो जबकि मेरा नाम संतोष कुमार हैं,
समाजशास्त्र का प्रोफेसर हूं मगर जिंदगी की किताब और हकीकत ज्यादा पढ़ाता सिखाता हूं।
आप की नजरों में हीरों हूं
बढ़िया देशी अंदाज में आपको पढ़ाता हूं आप सभी मेरे शब्दों को अच्छे तरीके से समझ जाते हो,
मेरे गुरुजी ने मुझे बताया था कि मातृ भाषा के साथ उम्र की भाषा समझना चाहिये,
आप सब मेरे ठेठपन तरीके को बेखूबी समझा बहुत प्यार दिया।
जिस दिन कालेज नहीं आया करता लोग खबर लेने घर पर चले आते,
घर पर महफ़िल जम जाता
मुश्किल से लोगों से पीछा छूट पाता।
तो परिवार की नजरों में विलेन बन गया हूं,
जबकि परिवार को सभी सुख सुविधा मेरे कारण नसीब हो रहा हैं।
लेकिन फिर भी परिवार में कोई इज्जत नहीं करता हैं,
आप लोगों में कई ऐसे हो जो अपने मेहनती पिता के संघर्ष को अनदेखा करके उनकी बुराई करते हो,
उनके अच्छे बातों में बुराई नजर आने लगता है
जबकि ये जीवन पिता के खून और पसीने से सींचा गया एक खूबसूरत पेड़ हैं जो बड़ा होते सबसे पहले अपने उस बदसूरत जड़ को त्यागने की कोशिश करता हैं,
जो उसे खूबसूरत बनाने के लिये खुद को कब का भूल जाता है।
शिक्षा का असली महत्व अपने माता-पिता और बड़ों का सम्मान करना है जो यहां पर बैठे सभी छात्रों से मैं उम्मीद करता हूं।
प्रोफेसर साहब का भाषण खत्म हो चुका था,
ताली की जगह अब लोग चुपचाप आंखों में आंसू लिये मूकदर्शक बन बैठे थे।
प्रोफेसर साहब समझ गये इन सभी को दर्शनशास्त्र का डोज कुछ ज्यादा ही दे दिया हूं,
फिर प्रोफेसर साहब माइक पर जोर देकर बोले” अरे मेरे क्लास में सीटी बजाने वालों आखिरी बार मेरे लिये ताली भी बजा दो।
उस दिन ताली तो बजा मगर उस ताली में कोई उत्साह और उमंग नहीं था,
उस दिन प्रोफेसर साहब के घर से लेकर कालेज तक सभी दुखी थे सबके अपने अलग दुख थे।
5 साल बाद नोएडा से दोस्त राजेश का फोन आया हालचाल हुआ
वो बोला”अरे समाजशास्त्र का प्रोफेसर एस के को जानते थे।
“हां क्यों
“अरे बहुत बुरी मौत मिला बेचारे को लाश 3 दिन से घर में सड़ रहा था वो अखबार वाले को गंध से पता चला कि प्रोफेसर साहब गुजर चुके हैं,
इकलौता बेटा कनाडा से आने में इनकार कर दिया,
समाजशास्त्र का अंतिम संस्कार पड़ोस के कुछ भले लोगों ने किया बेचारे को गैरो के कंधा मिला..

— अभिषेक कुमार शर्मा

अभिषेक राज शर्मा

कवि अभिषेक कुमार शर्मा जौनपुर (उप्र०) मो. 8115130965 ईमेल as223107@gmail.com indabhi22@gmail.com