सच दिखाता आईना
दर्पण में जरूर देखो
आज आपका रूप कौन सा था,
कुछ हलचल भरी थी या मौन सा था,
दर्पण झूठ कभी नहीं बोलेगा,
आपके कद नहीं चरित्र टटोलेगा,
रंग रूप वह किसी से छिपाता नहीं,
किसी को गलत बताता नहीं,
कोई गंगा में नहाए या समंदर में,
सांप प्रारंभ में जहर छोड़े या मध्यांतर में,
मानाकि हर सांप जहर नहीं छोड़ता
मगर हर जहर सिर्फ मौत देता है,
समय तनिक और आगे खिसक जाए भले
पर हर कर्म का नायाब हिसाब देता है,
बदल लो शत्रुओं के प्रति समर्पण,
क्योंकि वक्त को कहा गया है दर्पण,
समझ आते ही कितनों ने आईना देखा है,
मुकुट सर पर होकर भी
स्वतः हथियार फेंका है,
शस्त्र छोड़कर,सत्य अपनाकर
कुछ विरलों ने एक नया इतिहास बनाया है,
बौछारें हुई इतनी मोहब्बत की
कि आज भी हर दिल में समाया है,
हर दिन दर्पण देखने का प्रतिफल है संविधान,
तभी तो मसीहा ने नहीं दिया
इस स्वार्थी समाज खातिर
स्वयं के औलादों की मौत पर ध्यान,
हां है तुझमें जुनून तो जो इतिहास बदल डालो,
पर स्वयं को दर्पण में देखने
जरूर समय निकालो,
जरूर समय निकालो।
— राजेन्द्र लाहिरी
