अनुप्रेक्षा
मन में उठे भाव,
अनित्य का बोध दिलाए,
जीवन का सच।
धूप छांव जैसी,
क्षणभंगुर यह देह कहे,
अनुप्रेक्षा सिख।
नदियों का बहाव,
रुक न सके पल दो पल भी,
समय की धारा।
पत्तों की सरसर,
कहती जीवन क्षणभंगुर,
जग की सच्चाई।
शांत चित्त भीतर,
चिंतन में डूबा मन है,
अनुप्रेक्षा दीप।
गहरे धुंधलके,
सत्य की राह दिखाए,
मौन की वाणी।
तारों की झिलमिल,
बोलें अनित्य जीवन का,
क्षणिक सौन्दर्य।
हवा के झोंके,
कहते सब बंधन छोडो,
मुक्ति का संदेश।
चाँदनी की छांव,
आत्मा को समझाए बस,
शुद्धि की राहें।
बादल बिखरें,
क्षण में रूप बदल जाए,
अनुप्रेक्षा ज्ञान।
जीवन का आधार,
सच को पहचानना है,
अनुप्रेक्षा पथ।
मौन साधना में,
सत्य का दर्शन मिलता,
मन निर्मल होता।
— डॉ. अशोक
