कविता

रावण है बहुत खूॅंखार

रावण है बहुत खूॅंखार
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर,
मद, घृणा, द्वेष, भय और अहंकार,
दस दुर्गुणों वाला रावण है बहुत खूॅंखार ।

रावण है बहुत खूॅंखार बैठा सबके भीतर,
नकारात्मकता चाटुरिकता ये मनोविकार,
खत्म करना होगा इसको अवश्य इस बार,
तभी शुभकारी हुआ विजयदशमी त्यौहार ।

अधर्म की होगी फिर करारी हार जोरदार,
धर्म की लहराएगी सहर्ष “आनंद” पतवार,
खत्म होगा विश्व से तभी दुखदाई अनाचार,
जब सभी अपनाएंगे सद्गुण उन्नत व्यवहार ।

परंपराओं के निहित तथ्य हो पहले उजागर,
भरो मन में आत्मिक शुद्धता प्रेम का सागर,
न हो हत्याएं, न युद्ध हो, न हो कहीं भ्रष्टाचार,
मन का मैल हटे ऐसा छाए रश्मिरथी उजियार ।

मन को जीत सको तो जीतो संकल्प अपना कर,
अंतस जगे ज्ञान, बंद हो अतिशय बाह्य आडंबर,
कितना ध्येय समझा रावण का पुतला जलाकर,
क्या तुमने अपनाया श्री राम को भीतर सजाकर ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु