सामाजिक

सोशल मीडिया का,सूक्ष्म और आकर्षक भ्रमजाल,

सोशल मीडिया आज संपर्क और संवाद का सबसे तेज़ माध्यम बन चुका है, लेकिन यह भूल जाना ख़तरनाक है कि वहाँ दिखने वाली दुनिया असलियत नहीं होती। यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ लोग अपनी ज़िंदगी के केवल चमकदार हिस्से दिखाते हैं, जबकि हक़ीक़त के बोझिल, थके हुए, और टूटी हुई परतें कैमरे के बाहर रह जाती हैं। हर पोस्ट, हर तस्वीर, हर वीडियो के पीछे एक चयनित सच्चाई होती है,यानी जो दिखाना चाहें बस वही दिखाई देता है। नतीजा यह कि धीरे-धीरे लोगों ने असल ज़िंदगी की सादगी को छोड़कर आभासी जीवन की झूठी भव्यता को अपना आदर्श मान लिया है। इंसान अपने वास्तविक चेहरे से अधिक उस डिजिटल पहचान में डूबता जा रहा है, जो दूसरों के सामने “परफेक्ट” दिखती है। लेकिन यह परिपूर्णता की चाह मन की प्राकृतिक शांति छीन लेती है। आज अधिकांश लोग अनजाने में तुलना के दलदल में फँस चुके हैं, जहाँ दूसरों की मुस्कराहटें ईर्ष्या जगाती हैं, और दूसरों के सुख-दुख पर अंगूठा उठाना ही आत्म-संतुष्टि का माध्यम बन गया है।यह ठीक वैसा ही है जैसे दर्पण के सामने खड़े होकर ख़ुद की जगह दूसरों की परछाईं देखने लगना। सोशल मीडिया ने हमें “देखे जाने” की लत लगा दी है; अब हम जीवन जीने से ज़्यादा पोस्ट करने में व्यस्त हैं। खुशियाँ मनाने के बजाय उन्हें प्रमाणित करने की जिद ने आत्मिक शांति छीन ली है। यह भ्रमजाल इतना सूक्ष्म और आकर्षक है कि व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी वास्तविकता से कटने लगता है। रिश्ते केवल ऑनलाइन चैट तक सीमित हैं, भावनाएँ स्टेटस अपडेट बन चुकी हैं, और व्यक्तित्व लाइक्स की गिनती पर निर्भर रहने लगा है। यह स्थिति न केवल मानसिक तनाव को बढ़ाती है, बल्कि इंसान को भीतर से रिक्त कर देती है।सच्ची समझदारी यही है कि इंसान सोशल मीडिया को अपनी ज़िंदगी का आईना नहीं, एक उपकरण माने। इसका उपयोग जानकारी, संवाद और संपर्क के लिए करें, किंतु अपनी अस्मिता का निर्धारण इससे न करें। वास्तविक जीवन वही है जहाँ असफलताएँ हैं, संघर्ष हैं, लेकिन भावनाओं की गर्माहट भी है; जहाँ सच्चे रिश्तों में दिखावा नहीं, अपनापन है। आभासी मंच पर सच्चाई खोजने वाला व्यक्ति भ्रम में रहेगा, और भ्रम ही मनुष्य की सबसे बड़ी बर्बादी है। जब हम आभासी चमक से मोहित होकर वास्तविकता से मुँह मोड़ लेते हैं, तब हम आत्म-भ्रम के दलदल में उतरते हैं,जहाँ सच्चाई धीरे-धीरे मरती जाती है और बचता है मात्र दिखावा। इसलिए आवश्यक है कि इस काल्पनिक समाज से दूरी नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण संतुलन बनाया जाए, ताकि सोशल मीडिया हमें नियंत्रित न करे बल्कि हम उसे नियंत्रित करें। जीवन की खूबसूरती फ़िल्टर के नीचे नहीं, बल्कि अपूर्णता में छिपी है, और यही अपूर्णता हमारी सच्ची पहचान है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।