कविता

कैसा ये जीवन

कैसा ये जीवन
कि इसमें संतोष नहीं
ईश्वर ने हाथ दिए
हृदय दिया, पेट दिया
दी सुंदर आंखें
परंतु हुजूर को संतोष कहां?

मैं सोचता हूं
मौत के बाद
ये संपत्ति किस काम की
मेरा कोई अधिकार नहीं रहेगा
इस भौतिक संपदा पर
कोई खोज-खबर नहीं

कैसा ये जीवन
कुदरत का करिश्मा
बस और और और…
की चाहत में
हम आत्मसुख खो बैठे हैं
और मृग मरीचिका की तरह
भटक -भटककर
झूठी स्वप्न सामान जिंदगी
जी कर कूच कर जाते हैं ।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111