क्यों नहीं?
मुझसे छल होता देखके भी
ओ छलिया तू डिगा नहीं
तेरे भरोसे नाव थी मेरी,
क्यों दिखाई तूने दिशा नहीं
मेरे अंधेरे तेरे थे
तूने तो मुझको माना था
जग ठुकरा देगा मुझको
ये मुझसे अंजाना था
माया तेरे होने से है
क्या है जो तेरे वश में नहीं
फिर भी नाट्यक्रम को तूने
रोकने की करी कोशिश नहीं
क्या है मुझपे आज मेरा
जो था सबकुछ खो है दिया
मेरा अंजाम पता तुझको
तुझको क्यों आयी लाज नहीं
श्रृंगार मेरा सब बिखर गया
पायल टुकड़ों में टूट गयी
जब अंत ही सब कुछ था
क्यों किया आरम्भ को अंत नहीं
तेरा नाम ही मेरा मरहम था
मेरे घाव तुझसे छिपे नहीं
जिस रंग से निखारा मुझको
क्यों पहले छीना रंग नहीं
— सौम्या अग्रवाल
