जंगल में चुनौती
राजा की बादशाहत कम करने के लिए
जंगल के सभी जानवर मीटिंग में आए,
अपनी ओर से सबने सुझाव सुझाए,
बैठक में हाथी नहीं आया था,
जलन व दबदबे की डर से
किसी जानवर ने नहीं बुलाया था,
उधर वन की अव्यवस्था से सब परेशान थे,
राजा का समर्थन करने वाले
चतुर गीदड़ व सुवर बने हुए नादान थे,
अपनी अनदेखी से हाथी को बहुत गुस्सा आया,
अपनी ताकत दिखाने का फैसला सुनाया,
कानाफूसी और सोशल मीडिया से
बात चारों तरफ फैलने लगी,
अवसरवादियों की लंका जलने लगी,
हालांकि वे प्रारंभ में निश्चिंत थे,
शक सुबहा को जगह नहीं किंचित थे,
चूंकि राजा से सभी जीव परेशान थे,
उनके कथनी और करनी से हैरान थे,
हाथी के समर्थक इस बात से खुश थे कि
कम से कम हाथी तो हमें नहीं खायेगा,
उनका समर्थन इस बार बेकार नहीं जायेगा,
जंगल के बाकी जानवरों में थे
बाघ,तेंदुआ,लकड़बघ्घा,भालू और चीता,
मांसाहारी तो थे ही लेकिन सोचे नहीं थे
कि मंशा पर लग सकता है पलीता,
एक निश्चित दिन हाथी ने रैली बुलाया,
सारे डरे जीव रैली में आए तो
बहुतों की सत्ता लोलुपता का हो गया सफाया,
भीड़ देखकर मांसाहारी परेशान हो गए,
सत्ता की चाहत अब नुकसान हो गए,
अब अफवाह फैलाना ही एक सहारा था,
भक्तों को दे दिया गया इशारा था,
सबने रैली की भीड़ को राजा व हाथी की
मिलीभगत बताया गया,
लाखों की भीड़ को
हजारों का अफवाह फैलाया गया,
अब ये तो वक्त बताएगा कि
सत्ता की बागडोर किधर जाएगी,
राजा,हाथी या मांसाहारियों में से
निष्पक्ष चुनाव हुए तो जनता
किसके सिर पर ताज सजायेगी।
— राजेन्द्र लाहिरी
