यम द्वितीया (भैया दूज – “भाई– बहन” के स्नेह का प्रीतक)
बात अगर हमारे भारत देश की हो तो ऐसा कभी नहीं हो सकता कि हमारे देश में कोई त्योहार या परंपरा जो सांस्कृतिक विरासत संजोए हुए हो,उसका निर्वहन न किया जाता हो। भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर त्यौहार अपने भीतर प्रेम, स्नेह और रिश्तों की गहराई समेटे हुए है। जहां उत्तर दक्षिण ,पूर्व और पश्चिम क्षेत्रों के अपने अपने त्योहार होने के बावजूद लगभग पूरे भारत में भी इनको बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।इन्हीं सुंदर पर्वों में से एक है भैया दूज, जो भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व दीपावली के दो दिन बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। भैया दूज का अर्थ है –भाई(भैया) के प्रति बहन का स्नेह(प्यार)। इस दिन बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती है। इसको पंक्तियों में कुछ ऐसे भी कहा जा सकता है–
दीप जले हर घर के आंगन,
भैया दूज आया बनकर सावन।
बहना सजाए आरती की थाली,
भाई के माथे की तिलक निराली।
मिठाई, नारियल, दीपक प्यारे,
मन में उमड़े स्नेह हमारे।
भाई मुस्काए, बहना हँसे,
दोनों के मन प्रेम बसे।
यम-यमुना की कथा पुरानी,
भाई-बहन की अमर कहानी।
रिश्ता यह पवित्र महान,
स्नेह भरा यह सुंदर बंधन।
बहना मांगे खुशियों का वर,
भाई कहे – तू है मेरा घर।
जीवनभर यह साथ रहे,
प्यार का दीपक हाथ रहे।
हर घर में उल्लास बहे
भैया दूज सदा यूँ रहे।
प्रेम-सुगंध से महके संसार,
भाई-बहन का अमर प्यार।
भैया दूज या भाई दूज का मुख्य उद्देश्य भाई-बहन के पवित्र संबंध को सम्मान देना है। जैसे रक्षाबंधन पर बहन राखी बाँधकर भाई से अपनी रक्षा का वचन लेती है, वैसे ही भैया दूज पर वह तिलक लगाकर उसकी मंगलकामना करती है। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ खून का ही नहीं, बल्कि स्नेह, प्यार,विश्वास और अपनत्व का भी होता है। अगर बात भैया दूज को मनाने की पौराणिक कथा के बारे में की जाए तो हमें कई कथाएं सुनने को मिलती हैं जिनमें से
भैया दूज से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा यमराज और उनकी बहन यमुना जी की है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार यमराज अपनी बहन यमी (यमुना) से मिलने उनके घर पहुँचे। यमुनाजी ने उनका स्वागत किया। माथे पर सुंदर सा तिलक लगाया।इसके बाद स्वादिष्ट भोजन कराया और उनके कल्याण की कामना की। यमराज इस स्नेह से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी बहन को वरदान दिया कि जो भी इस दिन अपनी बहन से तिलक करवाएगा, उसे मृत्यु का भय नहीं रहेगा और उसे दीर्घायु प्राप्त होगी। तभी से यह दिन “भैया दूज(भाई दूज)” या “यम द्वितीया” के रूप में मनाया जाने लगा।
भैया दूज मनाने की परंपरा–
भैया दूज के दिन बहनें सुबह स्नान करके पूजा की तैयारी करती हैं। वे अपने भाइयों के लिए थाली सजाती हैं जिसमें तिलक, अक्षत (चावल), दीपक, मिठाई और नारियल रखा जाता है। भाई को तिलक लगाकर आरती उतारी जाती है, फिर मिठाई खिलाई जाती है। इसके बाद भाई बहन को उपहार या पैसे देकर उसका आशीर्वाद लेते हैं। जिन बहनों के भाई दूर रहते हैं, वे इस दिन उन्हें आशीर्वाद और शुभकामनाएँ भेजती हैं। कई स्थानों में इस दिन बहनें अपने भाई को तिलक लगाकर उनको नारियल गोला,रुमाल और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार भी दे देती हैं।
सामाजिक महत्व–भैया दूज का सामाजिक महत्व बहुत ही गहरा है। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम को और मजबूत बनाता है। आज के व्यस्त जीवन में यह अवसर भाई-बहन को एक साथ आने और अपने रिश्ते को याद करने का अवसर देता है। यह पर्व परिवार में एकता, प्रेम और सहयोग की भावना को भी बढ़ाता है।
संदेश–भैया दूज भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि रिश्तों में प्रेम, सम्मान और अपनापन ही सबसे बड़ी ताकत है। यह पर्व न केवल पारिवारिक बंधन को मजबूत करता है, बल्कि समाज में प्रेम और एकता का संदेश भी देता है। इस दिन का महत्व सदा बना रहे और हर घर में भाई-बहन का स्नेह अमर रहे — यही भैया दूज का सच्चा संदेश है।
— कैप्टन डॉक्टर जय महलवाल (अनजान)
