कविता

रश्मिरथी मिथक

वेदव्यास के महाकाब्य का चीरहरण करने वाले!
नमन तुम्हें हे रश्मिरथी कह उद्धारक बनने वाले!!
महिमा मंडन दिनकर ने अपने सुत का कर डाला।
कर्ण कुमारगगामी को कैसे हीरा कह डाला।।
कई अधर्मों षडयंत्रों में शामिल कर्ण हुआ था!
चीरहरण अभिमन्यु वध का हामिल स्वयं हुआ था!!
वेदव्यास की रचना संग दिनकर अन्याय हुआ है!
गांडीवधारी पार्थ पुरोधा का अपमान हुआ है!!
तुम तो न थे सूतपुत्र तुम तो खुद दिनकर थे!
जगती के आधार एकपक्षीय कैसे बन बैठे!!
पक्ष गहे कवि तो समाज की हानि बड़ी होती है!
सत्य मानते हैं जन उसकी कलम बली होती है!!
रश्मिरथी के जनक तथ्य को क्योंकर झुठलाते हो!
उर्वशी की हि भांति उजाला क्यों न बिखराते हो!!
है दुर्भाग्य सत्य का तुमने झूठ सत्य कर डाला!
महादेव की विजय पताका को हरि को दे डाला!!
रश्मिरथी कहने से राधेय का सम्मान बढ़ा है!
वस्त्रहरण करने वालों का जग में मान बढ़ा है!
रश्मिरथी यह कर्ण कथित षड़यंत्रों में शामिल था!
घोर अधर्मी दुर्योधन के पापों का भागी था!!
मात्र समर्थन नहीं कुकृत्यों को सच ठहराया है!
कैसे गढ़े कुतर्क सच्चरित्रों को लजवाया है!!
रश्मिरथी ने शस्त्र शास्त्र ऋषि परसुराम से पाए!
निज समाधि में रहा कहाँ से उपालभ्य ले आए!!
यह सच है कि कालखंड का था वह बड़ा धनुर्धर।
14 बार पराजित होकर भी जीवित था दुर्धर!!
पाँच मर्तवा वह अर्जुन से पहले भी हारा था!
भीमसेन से हुआ पराजित चार बार भागा था!!
पर दिनकर के खंडकाव्य में वह अजेय योद्धा है।
जो पौरुष के संग क्रोधी है निर्जन में रोता है!!
रश्मिरथी के हठ पर मोहन रहे उसे समझाते!
विजय अवश्यम्भावी पांडवों की राधेय को बतलाते!!
संशय न हो कर्ण युद्ध में अर्जुन ही जीतेगा!
ऐन्द्र, आग्नेय वायव्यास्त्रों से अहंकार छीजेगा!!
वज्र-गर्जना गांडीव की जब कानों तक आएगी!
दशों दिशाओं से तुमको बस मौत नज़र आएगी!!
छल बल से बांधव की नारी चाह रहा जो दूषण!
हे दिनकर तुम कैसे लिख डाले नरता का भूषण!!
भरी सभा मे जिसने स्त्री को निर्वस्त्र किया हो!
छल से विष देने व भस्म करने का यत्न किया हो !!
यही मनुजता और उच्चता की क्या परिभाषा है?
रश्मिरथी ये कर्ण अकेला नहीं सुयोधन भी है!!
द्रुपद बाण से बिद्ध हुआ यदि कर्ण ही रश्मिरथी है!
और विराट नगर से भागा राधेय महारथी है!!
अहंकार हे दिनकर जिसकी नसों में भरा हुआ है !
दैन्य पलायन जिसकी उपमानो से अटा पड़ा है!!

रश्मिरथी से
नहीं अर्जुन ! शरण मैं मागंता हूं !
समर्थित धर्म से रण मागंता हूं!! .” दिनकर”

रश्मिरथी क्या? दिनकर भी जो स्वयं युद्ध मे आते!
पार्थ सारथी के आगे खुद को निर्वीर्य ही पाते!!

— गणेश दत्त गौतम

गणेश दत्त गौतम

पिता- स्व शंभू दत्त गौतम माता- स्व. श्रीमती ललिता ज.ति. - 06-07-1967 अभिरुचि हिंदी - कविता एवं गीत लेखन सम्प्रति- इंस्पेक्टर (विशेष संक्रिया) फ्रंटियर मुख्यालय, बीएसएफ, भिलाई (छत्तीसगढ़) में सेवारत निवास-- ग्राम पिपरिया, उमरिया, मप्र मो.नं.-- 9462495285