कविता

संवैधानिक रास्ता चुनो

मत भूलिए कि संविधान ने
सबको अपनाया है बराबर,
कर दिया सबको सम
बाधाएं,अवरोध हटा कर,
क्या देशी विदेशी और क्या मूलनिवासी,
सब बन चुके हैं भारतवासी,
सारे पले बढ़े फैले मगर
सबके मूल में आदिवासी,
क्या पादरी,क्या मौलवी,क्या सन्यासी,
किसी को भगाने या मारने की बात कह
क्या हम नहीं कर दे रहे हैं
अपने सर्वश्रेष्ठ संविधान का अपमान,
कुछ लोगों की तुच्छ श्रेष्ठता पर क्यों दें ध्यान,
कोई अपने आप को उच्च कैसे कहता है,
उनके जेहन में क्या क्या भरा रहता है,
दरअसल सारा खेल पॉवर का होता है,
बिना पॉवर वाला अपनी सुखेन
मानसिकता लेकर हमेशा सोता है,
अगर कभी उच्च होने का खयाल आए,
अपनी हीनता रह रह सताए,
तो गलती से ही सही एक बार बस एक बार
एक होकर दिखाओ,
अपनी शासन सत्ता लाओ,
फिर उन्हें संविधान की ताकत दिखाओ,
फिर भी न समझे तो फिर सत्ता लाओ,
अनवरत इस प्रक्रिया को दोहराओ,
फिर देखना समता,समानता,बंधुत्व,
खुद बखुद कैसे आता है,
कोई किसी को जाति के नाम से कैसे सताता है,
यूं ही पड़े रह अपने दुख के दिन न गिनो,
दम है तो अपने हक़ अधिकार
संवैधानिक तरीके से छीनो।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554