सामाजिक

विकास गगनचुंबी इमारतों में नहीं, बल्कि बूढ़े माता-पिता की मुस्कान में छिपा है

अपना ही दांत जब अपनी जुबान को काट लेता है तो दर्द केवल शारीरिक नहीं होता, वह एक चेतावनी भी बन जाता है कि हर निकटता में एक खतरा छिपा होता है, और यदि संयम व समझ न रहे तो वही संबंध घाव का कारण बन सकते हैं, कुछ ऐसा ही आज हमारे घरों और रिश्तों की हालत है, जहाँ अपनों से ही दर्द मिलने लगा है, जहाँ बाप का शब्द बेटे को भारी लगता है और माँ की नसीहत बोझ, जहाँ संवाद की जगह चुप्पी ने ले ली है और गर्व जिसे   हम घमंड की संज्ञा दें तो अतिशयोक्ति नहीं  होगी,जिसने उस घर को राख कर दिया है जो कभी मोहब्बत की शरणस्थली हुआ करता था, ये नया युग बड़ी उन्नति का दावा करता है लेकिन इस प्रगति ने हमारी संवेदनाओं को इतना सिकोड़ दिया है कि रिश्ते अब जिम्मेदारी नहीं, बल्कि बाधा लगने लगे हैं, बुजुर्ग माता-पिता जो कभी घर के दीपक और दिशा थे, अब आज की पीढ़ी की नज़रों में एक वेस्टेज आइटम बनकर रह गए हैं, बड़े बुज़ुर्गों का अनुभव अब ज्ञान नहीं, बल्कि पुराने ज़माने की बात बन चुका है, उनके चेहरे पर झुर्रियों में उत्कीर्ण संघर्ष की कहानियाँ अब किसी को आकर्षित नहीं करतीं, हम भूल गए हैं कि यही हाथ कभी हमें चलना सिखाते थे, यही कांपती आवाज़ कभी हमारी सफलता की दुआ होती थी, पर आज वह आवाज़ घर के कोने में दबकर रह जाती है, क्योंकि मोबाइल की रौशनी ने अब माता-पिता की निगाहों की ऊष्मा को छीन लिया है, अब खाना मेज़ पर सर्व नहीं होता, स्क्रीन पर देखा जाता है, और घर ‘घर’ नहीं, महज़ एक साझा पते की तरह रह गया है जहाँ सब अपने-अपने खोलों में जी रहे हैं, जब घर की दीवारें परिवार को जोड़ने की बजाय अलग करने लगें, तो समझ लीजिए कि गिरावट सिर्फ आर्थिक नहीं भावनात्मक भी है, रिश्तों की गरिमा अब तार-तार होती दिखाई देती है, लोग एक-दूसरे से नहीं बल्कि एक-दूसरे के चलते दुःख पा रहे हैं, हम हर सफलता का जश्न ऊँची आवाज़ में मनाते हैं लेकिन अपने माता-पिता की ज़रूरतों को पूरी खामोशी में अनदेखा कर देते हैं, यह कैसी आज़ादी है जो अपने ही जन्मदाता के आँसुओं के बदले हासिल की जा रही है, यह कैसी आधुनिकता है जो संस्कारों को पुरातनता मानकर त्याग रही है, क्या बुद्धिमत्ता और संवेदना अब दो अलग दिशाओं में चलने वाले रास्ते बन चुके हैं? हम अपने बच्चों को टेक्नोलॉजी की भाषा सिखा रहे हैं, पर रिश्तों की भाषा उनसे छिनती जा रही है, यह स्थिति केवल कसूरवार युवा पीढ़ी की नहीं है, यह असफलता पूरे समाज की है जिसने मूल्य शिक्षा को गैर-ज़रूरी माना, जिसने ग्लोबल रेस में मानवीयता को हाशिए पर धकेल दिया, जिसने यह सोच लिया कि प्यार भी अब ‘समय मिलने’ तक सीमित रह सकता है, हमारे घर अब भावनाओं के मंदिर नहीं, प्रतियोगिता की प्रयोगशालाएँ बन गए हैं, जहाँ यह देखा जाता है कि कौन कितना बेहतर साबित हो सकता है, न कि कौन कितना अपना है, रिश्तों के टूटने की सबसे बड़ी वजह यह है कि हमने ‘सुनने’ की शक्ति खो दी है, हर कोई अपनी बातें कहता है, पर किसी की बात को समझने की कोशिश नहीं करता, जब शब्दों के बीच भावनाएँ मरने लगती हैं, तो घर का उजाला धीरे-धीरे मद्धम पड़ने लगता है, पहले कहा जाता था ‘घर दीवारों से नहीं, रिश्तों से बनता है’, लेकिन अब वे दीवारें भी थक चुकी हैं हर रोज़ की बहसों, आरोपों और शिकायतों से, हमने खुद के भीतर की गर्माहट को ठंडे तर्कों से बदल दिया है, और परिणामस्वरूप घरों में रिश्ते नहीं, केवल रूटीन बचा है, यह एक ऐसा युग है जहाँ माता-पिता बच्चों के लिए बोझ हैं और बच्चे उनके लिए चिंता, संवाद की डोर इतनी कमजोर हो चुकी है कि छोटी असहमति भी अब टूट का कारण बन जाती है, कई बार तो स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि घरेलू हिंसा, क्रोध और अपराध का रूप ले लेती है, जिसने भी गौर किया होगा, उसे दिखेगा कि रिश्तों का सबसे बड़ा शिकार बुजुर्ग हो रहे हैं,कभी दवा की कमी में, कभी प्रेम के भूख में, और कभी सिर्फ इस डर में कि कहीं उनकी मौजूदगी किसी की सुविधा में बाधा न बने, ये समाज के लिए ख़तरे की घंटी है, क्योंकि किसी भी सभ्यता की ताकत उसके परिवारों में निहित होती है, यदि घर का आधार ही कमजोर पड़ जाएगा तो आनेवाली पीढ़ी अपनी संवेदनाओं से शून्य होगी, हमें यह स्वीकारना होगा कि तकनीकी युग में मानवीयता को जीवित रखना सबसे बड़ा दायित्व है, यह कोई अभियान नहीं बल्कि आत्मबोध है, हमें पुनः उस दिशा में लौटना होगा जहाँ वृद्ध माता-पिता बोझ नहीं, गौरव हुआ करते थे, जहाँ रिश्ते निभाने के लिए नहीं, जीने के लिए होते थे, जो परिवार संवाद में विश्वास रखेगा वही भविष्य में स्थायित्व पाएगा, हमें युवाओं को यह सिखाना होगा कि विकास केवल गगनचुंबी इमारतों में नहीं, बल्कि बूढ़े माता-पिता की मुस्कान में छिपा है, वक़्त आ गया है कि हम संबंधों की सर्जरी करें, क्योंकि यह घाव अब फोड़ा बन चुका है, यह समाज तभी सुरक्षित रहेगा जब संवेदनाएँ फिर से जागेंगी, जब कोई बेटा अपने पिता के कंधे पर गर्व से हाथ रखेगा, जब कोई बेटी अपनी माँ के आँसू को शब्दों नहीं हृदय से पढ़ेगी, इसी दिन से फिर हमारी संस्कृति की लौ प्रज्वलित होगी,तभी घर, फिर से घर कहलाएगा।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।