कोंपलें खिलें यही ज़िंदगी है
धीरे से बोली,
सुबह की पहली किरण —
“उठो, मुस्कुराओ।”
ओस की बूँदें,
फूलों से बातें करतीं,
सपनों की भाषा।
मिट्टी की गोद में,
एक नन्ही साँस उभरी,
जीवन का वचन।
टहनी ने कहा,
“हर गिरा पत्ता देगा
नया हरापन।”
हवा ने छुआ,
नींद में लिपटी कली —
गीत बन गई।
सूरज की हँसी,
पत्तों पर छलकी जैसे,
माँ की ममता।
हर पतझर के बाद,
फिर से उम्मीद जागे,
बसंत लौटे।
कोंपलें खिलीं,
मन की धरती बोली —
“यही ज़िंदगी है।”
— डॉ. अशोक
