क़िरदार से जुदा
एक कहानी का
क़िरदार अपने ही
क़िरदार से जुदा हो गया……
ज़िंदगी में अपनों के
मायने जब समझा
हर वो अपने का भाव
मौन आँखों से ओझल हो गया…..
सादगी से जीता क़िरदार
साजिशों मे झुलस गया….
बिन एहसासों की दुनियां में
एक क़िरदार खत्म हो गया….
हारा है वो भी अपनों से
हारा कभी जब सपनों से
आँखों से ढुलकते आँसू
कहानी कह जुदा हो गया…
रौंद के मारा एहसासों को
आस का कतरा ख़ाक हुआ
राख बची रुह के हवाले कर
जींवन के सफ़र का अंत हो गया…
क़िरदार की सिसकी गूँजी
फिर ना सुबह की आस में
खत्म हुई कल की पारी
झूठ के ख़ातिर सच को
हमेशा जलाता रहा..
अपने ही बारी आग से
फिर वो किरदार ..
वफ़ा के किरदार से जुदा हुआ…
कि प्रेम को खुद में जी कर
क़िरदार को कहानी से जुदा किया..!!
— नंदिता
