अंतराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस
बुजुर्गों की सेवा करना कोई उपकार नहीं, बल्कि संस्कार हैं,
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस केवल एक स्मरण दिवस नहीं, बल्कि हमारे उस नैतिक दायित्व का प्रतीक है जो हमें अपने समाज के अनुभवी, त्यागमय और स्नेह से भरे बुजुर्गों के प्रति निभाना चाहिए। इस दिन का उद्देश्य न केवल वृद्धों के योगदान को स्वीकार करना है, बल्कि उस चेतना को भी जगाना है जो हमें यह समझाती है कि जीवन के हर पड़ाव का अपना मूल्य होता है। जिस पीढ़ी ने अपना युवा काल परिवार और समाज के निर्माण में समर्पित कर दिया, वही आज जीवन के उत्तरार्ध में सम्मान, सहानुभूति और गरिमा की अपेक्षा रखती है। दुर्भाग्य से आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में बुजुर्गों के प्रति सम्मान धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलता जा रहा है। भौतिक सुविधाओं और तकनीकी प्रगति के इस युग में जब हर कोई अपने सपनों की दौड़ में व्यस्त है, तब बुजुर्गों का अकेलापन एक मौन सच्चाई बन गया है। एक समय था जब परिवारों की नींव उनके अनुभवों पर टिकी होती थी, आज वही अनुभव अक्सर अनसुनी सलाहों की तरह दरकिनार कर दिए जाते हैं। लेकिन यह भूल जाना हमारी सबसे बड़ी त्रुटि है कि वृद्धजन किसी भी समाज की जीवित विरासत होते हैं। उनकी कहानियाँ, उनका जीवन-संघर्ष, उनका स्नेह भरा मार्गदर्शन,ये सब वह ज्ञान-संपदा हैं जो नई पीढ़ी को दिशा देती हैं। जिन हाथों ने हमारे लिए जीवन की नींव रखी, वे हाथ जब उम्र के भार से कांपने लगते हैं, तब हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम उनके सहारे बनें। अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस इस संवेदना को फिर से जीवित करने का अवसर है। यह हमें स्मरण कराता है कि बुजुर्गों की सेवा करना कोई उपकार नहीं, बल्कि संस्कार है। जब परिवार बुजुर्गों को केंद्र में रखकर अपने संबंधों की बुनियाद मजबूत करेंगे, तब ही समाज मानवता के असली अर्थ को समझ पाएगा। सरकार की योजनाएँ, पेंशन योजनाएँ, वृद्धाश्रम या स्वास्थ्य सुविधाएँ तभी सार्थक होंगी जब हम आम नागरिक इस जिम्मेदारी को भावनात्मक रूप से महसूस करेंगे। हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ वृद्ध न केवल सम्मानित हों बल्कि सक्रिय और आत्मनिर्भर जीवन जी सकें, जहाँ उनका अनुभव युवा पीढ़ी की ऊर्जा के साथ मिलकर एक सुदृढ़ सामाजिक संतुलन रचे। यह दिन हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हम अपने बुजुर्गों को वही स्नेह दे रहे हैं जो उन्होंने बचपन में हमें दिया था? क्या हम उनके अकेलेपन को पहचानते हैं या उसे “समय की व्यस्तता” कहकर टाल देते हैं? अब समय है कि हम अपने दृष्टिकोण को बदलें। किसी वृद्ध का हाथ थामना, उनकी बातें सुनना, उनके अनुभवों का सम्मान करना यही सच्ची श्रद्धांजलि है। अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस हमें यही सिखाता है कि समाज तभी सभ्य कहलाएगा जब उसके सबसे वृद्ध सदस्य खुद को सम्मानित, सुरक्षित और आत्मीय महसूस करेंगे, क्योंकि जीवन के संध्या समय में उन्हें किसी आर्थिक सहायता से अधिक, आत्मीयता और अपनापन चाहिए होता है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
