बोधकथा

एक रोटी का रिश्ता

तत्काल पासपोर्ट के चक्कर में सुबह से ही सुशील और उसका मित्र पासपोर्ट दफ़्तर की लंबी कतार में लगे थे। फॉर्म लिया, भरा, दस्तावेज़ लगवाए—सब हो चुका था। अब बस फीस जमा करनी थी, और पासपोर्ट का रास्ता साफ़ हो जाता। लेकिन जैसे ही उनकी बारी आई, खिड़की पर बैठे बाबू ने बड़ी बेपरवाही से शटर गिरा दिया— “समय ख़त्म हो गया है, कल आना।”

सुशील ने हाथ जोड़कर कहा, “भाई साहब, पूरा दिन बर्बाद हो गया, बस फीस ले लीजिए।”

बाबू ने त्योरी चढ़ा दी, “पूरा दिन बर्बाद हो गया तो क्या मैं ज़िम्मेदार हूँ? सरकार से कहो ज़्यादा लोग भर्ती करे। मैं तो सुबह से काम कर ही रहा हूँ।”

सुशील का मित्र मायूस होकर बोला, “चलो अब कल आएंगे।”

सुशील ने उसे रोका, “रुको, एक कोशिश और करता हूँ।”
बाबू अपना थैला उठाकर निकल चुका था। सुशील बिना कुछ कहे उसके पीछे हो लिया। वह कैंटीन में जाकर बैठा, लंच बॉक्स खोला, और चुपचाप खाने लगा।

सुशील सामने की बेंच पर बैठ गया। “आपके पास तो रोज़ बड़े-बड़े लोग आते होंगे?”

वह गर्व से बोला, “हाँ, आईएएस, आईपीएस, विधायक—सब लाइन में खड़े रहते हैं मेरी खिड़की पर।”

सुशील ने मुस्कुराकर कहा, “तो क्या अपनी कुर्सी की इज़्ज़त करते हैं?”

वह चौंका, “मतलब?”

सुशील ने कहा, “मतलब ये कि अगर आप सच में अपने पद का सम्मान करते तो इस तरह रुखा व्यवहार नहीं करते। देखिए, आप अकेले खाना खाते हैं, दफ़्तर में भी मायूस रहते हैं, लोगों का काम अटकाते हैं। बाहर से कोई सुबह से परेशान होकर आता है, और आप कहते हैं— ‘सरकार से कहो भर्ती करे।’ भर्ती हो जाएगी तो आपकी अहमियत कम हो जाएगी, शायद ये कुर्सी भी चली जाएगी। भगवान ने आपको मौक़ा दिया है रिश्ते बनाने का, और आप इसे बर्बाद कर रहे हैं।”

वह चुप हो गया। कुछ पल बाद बोला, “साहब, आपने सही कहा। पत्नी मायके चली गई है, बच्चे मुझसे बात नहीं करते, माँ रोटियाँ बनाकर चुपचाप रख देती है। रात को घर जाने का मन नहीं करता। समझ नहीं आता गड़बड़ी कहाँ है।”

सुशील ने कहा, “गड़बड़ी आपके ‘कट जाने’ वाले रवैये में है। किसी की मदद कर सकते हैं तो कीजिए। आज मैं यहाँ अपने दोस्त के पासपोर्ट के लिए आया हूँ, मेरा खुद का पासपोर्ट है। फिर भी मैंने आपके आगे मिन्नत की—निस्वार्थ भाव से। इसलिए मेरे पास दोस्त हैं, आपके पास नहीं।”

वह उठा, बोला, “आइए, आपकी फाइल जमा कर देता हूँ।” काम हो गया। उसने सुशील का नंबर मांगा, और सुशील ने दे दिया।

बरसों बीत गए। इस दिवाली एक अनजान नंबर से कॉल आया— “साहब, मैं रविंद्र कुमार चौधरी बोल रहा हूँ। कई साल पहले आप मेरे पासपोर्ट ऑफिस आए थे, और मेरे साथ रोटी खाई थी। आपने कहा था, पैसे नहीं, रिश्ते कमाओ।”

सुशील मुस्कुराया, “हाँ चौधरी साहब, याद है। कैसे हैं?”

वह भावुक स्वर में बोला, “उस दिन आप चले गए, पर आपकी बात मेरे दिल में बैठ गई। अगले दिन पत्नी के मायके गया, बहुत मिन्नतें कर उसे घर लाया। खाने बैठी तो उसकी प्लेट से एक रोटी उठा ली, कहा—’साथ खिलाओगी?’ वह रो पड़ी, मेरे साथ आ गई। बच्चे भी लौट आए। अब पैसे नहीं, रिश्ते कमाता हूँ। जो आता है, उसका काम कर देता हूँ। आज आपको दिवाली की शुभकामनाएं देने और बिटिया की शादी में बुलाने के लिए फोन किया है। आशीर्वाद ज़रूर देना।”

फोन रखकर सुशील देर तक सोचता रहा— वाकई, आदमी कारणों से नहीं, भावनाओं से चलता है। कारण से तो मशीनें चला करती हैं।

— पूजा अग्निहोत्री

पूजा अग्निहोत्री

पति का नाम - श्री प्रदीप अग्निहोत्री उपलब्धियाँ - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। पता - थाना रामनगर, काली मन्दिर के पास राजनगर, जिला- अनूपपुर (मध्य प्रदेश) पिन- 484446 मो. 09425464765 ईमेल - agnihotrypooja71@gmail.com