सब कुछ नेता होता है
यहां उपस्थित सभी लोगों के साथ
सिंहासन पर विराजमान
सरपंच और पंच को नमन करता हूं,
उसके बाद उपस्थित अन्य लोगों के साथ
बारंबार इस मंच को नमन करता हूं,
यहां मेरे विभाग के मेरे अधिकारी भी हैं,
हमारे बीच तालमेल और तैयारी भी है,
उन्हें नमन करना भूल गया तो भी
किसी न किसी तरीके से मना लूंगा,
हमारे बीच की बात है मुद्दा सुलझा लूंगा,
मगर मुझे नेता से सबसे ज्यादा डर लगता है,
इन प्रतिनिधियों का चेहरा कहर लगता है,
ये बार बार हिस्सा नहीं देने की बात करता है,
कड़ी सजा दिलवाने,देख लेने की बात करता है,
जिन्हें बोलना,लिखना नहीं आता है,
वो बस्तर फिंकवा देने की धमकी सुनाता है,
लोग कहते हैं कि डर के आगे जीत है,
लेकिन वो तो इनसे भी भयानक चीफ़ है,
सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए बिना
सीधे मुंह बात नहीं करता है,
अपने जुबां पर दिव्य और अलौकिक
शानदार अपशब्द धरे रहता है,
गुस्से में एक दिन मैंने नेताजी को छेड़ दिया,
कहा कि पॉवर तो
सांसद,विधायक का दिखा रहे हो,
बड़े नेता हो तो फटफटी में
क्यों इधर उधर आ जा रहे हो,
फिर क्या था नेताजी का ईगो हर्ट हो गया,
और मुझे अपने जॉब से ऐसे आउट कराया
कि मैं छोटा बैट्समैन और
वो अंपायर डिकी बर्ट हो गया,
गुस्सा तो मुझे भी आया तो अब मैं
उनके विरोधी दल में शामिल होने जा रहा हूं,
इस दावे और वादे के साथ कि
अतिशीघ्र युवा नेता बनके आ रहा हूं।
— राजेन्द्र लाहिरी
