ग़ज़ल
खूब थपेड़े सहते हैं
जो धारा में बहते हैं
शौक़ीन तबीयत वाले
उम्दा उम्दा गहते हैं
होते हैं जो यार लचीले
देर तलक वो रहते हैं
बच्चों खातिर मात पिता
सर्दी गर्मी सहते हैं
दूरंदेश सदा इंसां
बात समय पर कहते हैं
— हमीद कानपुरी
खूब थपेड़े सहते हैं
जो धारा में बहते हैं
शौक़ीन तबीयत वाले
उम्दा उम्दा गहते हैं
होते हैं जो यार लचीले
देर तलक वो रहते हैं
बच्चों खातिर मात पिता
सर्दी गर्मी सहते हैं
दूरंदेश सदा इंसां
बात समय पर कहते हैं
— हमीद कानपुरी