लघुकथा

लापरवाही

” कितनी बार समझाया? मानती नहीं हो। सच्चाई तो जानती ही हो। फिर भी…”

” मेरा बेटा आज अपंग हुआ बिस्तर पर पडा है। जिस कलमुहे ने उसे घायल किया, मैं उसकी जान ले लूंगी।”

“अरी भागवान, यही बात वह माँ भी दोहरा रही है। अपने बेटे के कातिल को ढूँढ रही है।”

” तो क्या, वह नहीं रहा? गलती हमारे बेटे की थी?”

” एक दूजे पर दोषारोपण करने से अच्छा हो, हम जन जागृति का प्रयास करे।”

“लापरवाही से बचने का संकल्प करें।”

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८