कविता

जीवन को कृतार्थ है बनाना

परिस्थिति चाहे हो या नहीं हो अपने बस में,
मन की स्थिति को हमें एकाग्र व शांत है रखना,
कुछ लोग आशीर्वाद व दुआएं देंगे जीवन में,
कुछ चोट भी पहुंचाएंगे हमें आभार है जताना ।

होता हैं नित नया कुछ न कुछ घटित प्रकृति में,
चिड़िया चिंता छोड़ फिर भी गाती हैं मीठा गाना,
पशु-पक्षी परमात्मा को साक्षी मान जीवन में,
चलते हैं प्रतिदिन नीड़ो से अपने ढूॅंढने को दाना ।

आज समय कुछ, कल कुछ और होगा जीवन में,
क्यों अवसाद में रह आज के “आनंद” को घटाना,
करने आए हैं हम कुछ श्रेष्ठतम् कर्म जीवन में,
क्यों शिकायतों से फिर दिल को अपने दुखाना ।

हर जीव की अधूरी है प्यास जन्म-मृत्यु के फेरे में,
लोभ मद मत्सर के बंधनों में क्यों ध्येय भूलाना,
माफ़ करने की व्यवस्था की हैं प्रभु ने जीवन में,
हमें सुपात्र बन सभी पापों का प्रायश्चित हैं करना ।

मेरा-तेरा ये तुच्छ विचार आते हैं भ्रमित मन में,
हमें इससे कोसो आगे जा परम तत्व को है पाना,
पुण्य प्रताप से पाई है मनुष्य योनि इस जन्म में,
सुसंस्कारों से इस जीवन को कृतार्थ हैं बनाना ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु