एक नजर
प्लेटफार्म पर गाड़ी ससरती हुई रुक गयी थी।अनाउंसमेंट की आवाजें, भीड़ का शोर और उतरने-चढ़ने वालों का एक-दूसरे से उलझना।यह सब देख सर चकरा सा गया और मैं वहीं एक जगह कुछ देर के लिए आंखें मूंद टेक लेकर बैठ गया। मेरी गाड़ी के आने में अभी कुछ वक्त था। अचानक से मुझे लगा कोई चीज मेरी जंघा पर रेंग रही है।नजरें नीची की तो देखा एक नौ या दस वर्ष का बच्चा था। मैं सीधा होकर बैठ गया। उससे पुछा -“क्या चाहिए।”
उसने कहा -“पैसा दो न! बिस्कुट लूँगा।”
मैंने कहा- “ठहरो !मैं दिला देता हूँ।”
उसने कहा-“नहीं पैसा दो। मैं माँ को दूंगा वह मुझे बिस्कुट ले देगी।”
मैंने कहा-“मेरे पास छुट्टे नहीं हैं। इसलिए मैं खरीदकर दे देता हू़ँ। बिस्कुट ही चाहिए न!चलो मेरे साथ सामने ही दुकान है।”
उसने गुस्से से कहा-“बोला न माँ लेकर देगी फिर बार-बार एक ही बात काय को करते हो।
मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।कितनी निडरता से कह रहा है यह।
मैंने कहा-” कितने पैसे लोगे जिससे तुम्हारी बिस्किट आ सकती है।”
उसने कहा- “आता हूँ मैं माँ से पुछकर,वो बैठी है।आज मां बीमार है इसलिए कुछ नहीं ला पाई खाने के लिए।
उसने हाथ के इशारे से एक महिला की ओर दिखाते हुए कहा।
मैंने देखा महिला दीवार के सहारे बैठी थी। आने-जाने वालों से खाने के लिए मांग रही थी।
मैंने कहा-“ठीक है।जल्दी आना।मुझे जाना भी है।”
उसने कहा- “तुरंत आता हूँ।”
इस बार अपने साथ में वह एक बच्ची लेकर आया।
मैंने पुछा-कौन है यह..?
उसने कहा- “बहन है साहब। देखिए कितनी सुंदर है।सब लोग इसे देखते है।”
मैंने कहा-“हाँ! सचमुच बहुत सुंदर है और प्यारी भी। बिल्कुल तुम्हारी तरह।”
उसने कहा- साहब मेरी माँ भी बहुत सुंदर है। मैंने उसे सौ के नोट पकड़ाए और सीधा उसे उसकी मां के पास जाने को कहा।
मेरे मुंह से अनायास ही एक सवाल निकल गया – “तुम्हारे पिता…?”
“साहब मां कहती है कि बहुत कुरूप है। तुम लोग डर जाओगे।”
— सपना चन्द्रा
