पुरूष
मन होता कोमल तो भी बनते सख़्त हैं
आंसुओं को छुपाते जाने क्यों हर वक्त हैं।
कभी भावनाओं पे न ज़ोर चले तो छुपाते,
कुछ आँसु बहा फिर अपनों के आगे मुस्कुराते।
निकल पड़ते काम पर जोश से सूट बूट टाई में,
कम ही सोचते हैं कभी अपनी ही भलाई ये।
घरवालों की ज़िम्मेदारी उठाना खुद सीख जाते हैं,
अपनी ख्वाहिशों पर काबू पाने में भी जीत जाते हैं।
खुद साधारण से भी बन चल पड़ते हैं काम पर,
कभी काम के लिए भागते और जागते हैं रात-भर।
सबकी ज़रूरतें ऊपर खुद की जाने पीछे रखते हैं,
अपने पे खर्च करने से पहले कितना सोचते हैं।
माँ,बहन,पत्नी, बच्चे सबको खुश रखना चाहते हैं,
हर करते हैं जत्न हालात कभी जेब झांकते हैं।
है स्त्री और पुरुष चाहे एक समान जग में मगर,
उस ईश ने ही कुछ तो अलग भावनाएं दी हैं आखिर।
— कामनी गुप्ता
