कविता

शीत ऋतु काल

विदा कर बरखा रानी को शरद ऋतु ने रंग जमाया,
सुबह और शाम चारों ओर घना श्वेत कोहरा है छाया,
दिन हुए छोटे लम्बी हुई अब रातें ये शीत ऋतु काल,
ठंडी-ठंडी ठिठुरन भरी हवाओं से तन-मन कपकपाया ।

वृक्षों ने बड़ी ही धैर्यता से शुष्कता को है अपनाया,
कुछ सूखे पत्तों ने चुपके से धरती को गले है लगाया,
तपतपाती स्वर्णिम रश्मि रथियों ने मद्धिम की हैं चाल,
ओस की टिमटिमाती बूॅंदों ने हर मन को है रिझाया ।

हरसिंगार के फूलों ने वसुंधरा को है अनुपम सजाया,
पुष्पों के इर्द-गिर्द डोल भौरों ने प्रेम गीत गुनगुनाया,
फुर-फुर धुऑं मुॅंह से निकले और गुलाबी हुए है गाल,
अंगींठी पर जलते अलाव से तन-मन ने सुकून पाया ।

पर्वतों ने ओढ़ी हिम चादर रवि किरणों ने सौंदर्य बढ़ाया,
प्रकृति ने सौम्यता व “आनंद” का भाव भीतर जगाया,
तन पर सजे स्वेटर, मफलर, जैकेट, कनटोप और शॉल,
कंपकंपाते हाथ पैर रजाईं में दुबकने का मौसम आया ।

खान-पान के शौक़ लजीज व्यंजन जाड़ा संग है लाया,
हरी सब्जियों, फलों और सूखे मेवों में अमृत हैं समाया,
योग, ध्यान,व्यायाम से मिले ताज़गी स्फूर्ति बेमिसाल,
तन-मन को आरोग्यवान शक्तिशाली हमने है बनाया ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु