कविता

दीपोत्सव में अवनि पर आज

दीपोत्सव में अवनि पर आज,
अनेक प्रदीपों के दर्शन हुए;
कितने तरह के दीपकों को,
कितने मानव कितनी भाँति जलाए!

सुंदर सजी अवलियों में वे जले,
अलग-अलग स्वरूप दिखलाए;
प्रज्ज्वलित हो कुछ बुझे कुछ सहमे,
कोई तेल पा तो कोई हवा सह जिये!

मोमबत्तियाँ जली पिघलीं झुकीं,
दीपकों पर गिरीं जिन्हें कोई उठाए;
नर नारी उनकी जीवन ज्योति निहारे,
कितने शिशु बृद्ध बुझने से बचाए!

कोई तेल डाले तो कोई पुनः जलाए,
किसी लौ से बुझी बाती सुलगाए;
कोई टकटकी लगा यह लीला देखे,
कोई उनके दर्द या आनन्द जाने!

हर आत्मदीप ब्रह्म ही रहे हैं सजाये,
काया मन-माया वे हैं चित्त से साधे;
दीक्षा दे गुरु ही ‘मधु’ को रहे पाले,
वे ही रहे हैं जीवन ज्वाला सँभाले!

— गोपाल बघेल ‘मधु’